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रविवार, 3 मई 2015

कविता-१३२ : "जिंदगी का चिराग़..."


जिन्दगी का चिराग बुझ गया है 
आज साँसे रुक गई है...

धड़कने थम गई है
रुक गया है ये जीवन सागर
टूट गई ये माटी की गागर
माटी आज माटी में मिल गई...

आत्मा शरीर से निकल गई
भूत / वर्तमान
इतिहास बन गया...
भविष्य सिर्फ एक राख बन गया
आग की लपटे..
पंचतत्व की और जाने लगी
पिछला जीवन
पिछली यादें मिटाने लगी
यह कोई खेल नहीं...

प्रकृति का एक केवल...
एक ही सत्य है...
मौत है इसका नाम
इस पर...
मानव जाति का नहीं वश है...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


शनिवार, 2 मई 2015

कविता-१३१ : "सिंदूर..."


तेरी मांग में भरा था...
एक सिक्के से लाल सिंदूर
सिंदूर ही था...

कोई लक्ष्मण रेखा नहीं जो
बांधती तुझे हरदम
मर्यादाओ में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 1 मई 2015

कविता-१३० : "मजदूर या मजबूर..."



मजदूर________

तुम मजदूर हो या नहीं
तय करने का पैमाना नहीं
क्योकि...
काम तो सभी करते है
पर मेरे हिसाब से
मजदूर तुम मजबूर जरूर हो
और तुम्हारी मज़बूरी ने ही
मजदूर की संज्ञा दी होगी
विचारणीय ?

मजदूर.....
दूर भी है सुख सुविधाओ
और ऐशो आराम की जिंदगी से
 पर ये दूरी या मज़बूरी
मजदूर को पास भी करती है
और खास भी...

कितने निश्चिन्त होकर सो जाते
किसी भी पेड़ के नीचे
या हाँथ ठेले पर

ईधर तो लोगो को मखमली
गद्दे पर भी नींद चैन कहाँ
अब ?
तिजोरी जो भरी है
चोरी की आशंका
सोने नहीं देती......

सच रोटी वाले लोगों के पास
भूख नहीं
मजदूर भूखा है
रोटी को दौड़ता है
पसीना गिराता है
और पेट भर खाये या न खाए

बड़ा चैन आराम पाता है
मजदूर
दूर हो सकता है
पर पास भी तो है
और लोगो की तुलना में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कविता-१२९ : "और ख़ुदा मेरा...."


हो गये बहुत दिन अब...

लिखना ही होगा बेहतर
खुद के लिये और तुम्हारे लिये भी
क्योकि तुम दिल से होते हुए
आते हो दिमाग पर
और दिमाग से विचारो के संग
घुलकर अहसासों में आ बैठते हो
कलम पर....

और बहने लगते हो नीली स्याही संग
श्वेत कागज पर...

और उकेरे हुए आखरो में तुम्हारा चेहरा
जैसे सागर की लहरों पर
वक्त की उँगलियों के निशान....

सृजित हुए आखरो में जो
दिखता है.. वह ही होता होगा
कविता या कोई शब्द श्रंगार
पर मेरे लिये सिर्फ और सिर्फ
तुम... सिर्फ तुम ...

हां तुम ही.....
और तुम में मै खुद
और खुदा मेरा...!!!


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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

कविता-१२८ : "अफसाना जिंदगी का...."


कागज को उठाया ही था

कलम भी पास थी
और दवात भी ..

तुम आ गये तभी...
मुस्कराये..
कसमे खाई..
हाँथ थामा..
रूठे..
टूटे..
वादे तोड़े...
और छोड़ दिया तन्हा..


फिर क्या ??
देखा कागज पर
लिखा था...
अफसाना जिन्दगी का...
सच !!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

कविता-१२७ : "सांझ क्यों हो गई ?"



अरुणोदय हुआ.....

रागिनी रौशनी छा गई
पर !
अचानक
तुम रूठ गये...
सपने टूट गये..


ख्वाहिशे बिखर गई..
बिछड़ ही गये आखिर...

ओह !
सांझ क्यों हो गई ?
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

कविता-१२६ : "नाजुक सी हथेलियों ने..."


उस रात मेरी सुर्ख लाल आँखों से

गिरते हुए अश्रुओ को

थामा था जिन नाजुक सी हथेलियों ने

वो तुम ही थे....

मेरी गूंगे मौन के दिये थे जब
साहस के स्वर
वो भी तुम ही थे...

मेरी अधखुली आँखों में पल रहे
सपनो को
हकीकत में बदलने वाले
सिर्फ तुम्ही थे...

मेरी उदगारो की नीले स्याह को
कागज पर सवारने वाले
तुम ही थे...

मेरे हर कठिन मोड़ पर
संघर्षो के उफ्नाव पर 
सहारा देने तुम हां
सिर्फ तुम ही थे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

कविता-१२५ : "नर और नारी..."


नदी थी तुम...

मै पहाड़ सा...

कल्लोल करके बहती तुम

मै ढीठ अडिग खड़ा-खड़ा...

तुम कोमल फूल सी

मै शूल सा...

तुम मोम सी
मै इस्पात सा..

तुम हो तुम सी
मै हूँ मै सा...

तुमने दिया बहुत कुछ

मैंने लिया बहुत कुछ...

क्योकि...
तुम नारी हो 
और मै नर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________



रविवार, 26 अप्रैल 2015

कविता-१२४ : "हे औरत..."


बिटिया...

तुम लड़की बन गई
लड़की तुम...

युवती बन गई...

युवती तुम महिला...
महिला तुम वृद्धा बन गई
पर हे औरत...

तू क्यों बनी रही अबला ही
जिन्दगी भर...

क्यों न पा सकी अधिकार 
पुरषो के जैसे
कभी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

कविता - १२३ : 'फरेब...'

चारो और फरेब है धरती पर
इसलिए
ये प्रकृति का तांडव भी
धरती पर...

काँप गई ये धरती आज
दिए कुछ झटके से
चेतावनी ही शायद
फरेब के ठेकेदारो को

धरती पुत्र किसान
जब लटकेंगे पेड़ो पर
तो ये धरती कांपेगी रोयेगी
और हद के बढ़ने पर

मिला लेगी सृष्टि को
अपनी ही देह में
एक दिन...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

कविता-१२२ : "उन खुबसूरत पलों में...."


उन खूबसूरत पलो में...

कितनी शर्माई थी तुम...
तुम्हारे रोम रोम में लज्जा भरी थी...
झुकी पलकों से तुम्हारे मौन ने
जो कहा था मुझसे...
वो आज भी याद है...

तुम्हारा पहला स्पर्श / छुअन
और गुदगुदी रेशमी बालो की..
भूल सकता हूँ कैसे भला ??

फिर नयी रेशमी चादर पर
सिलवटो के निशान..
कितनी तेजी से जकड़ा था
अपनी मुट्ठी से तुमने...

और फिर मेरी पीठ पर
तुम्हारे नाखून के निशान से
रिसता है प्रणय आज भी
जो नहीं देता भूलने

भूलकर भी तुम्हे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

कविता-१२१ : "नटिनी..."




नटिनी तू चलती रही रस्सी पर

दबे पाँव बिना कोई आवाज के

ऊपर आकाश और जमीन के बीच
क्या नहीं दिखा होगा तुम्हे...

डर भय पीड़ा या मौत
पर ये सब दब गया होगा न
उस पापी छह इंच के पेट के नीचे
और तुम्हारे उन भूखे बच्चो की खातिर..

नीचे बिछी होगी एक फटी सी चादर
बज रहा होगा डमरू
भीड़ डाल रही होगी सिक्के उछलकर..
कुछ ने तुम्हारी फटी चोली पर
फब्दियाँ भी जड़ दी होंगी...

आदत जो हो गई तुम्हे इन सब की
उतर भी गई होगी सुरक्षित
उठा कर पैसे , चली गई होगी कही और
किसी और चौराहे पर...

जीने की एक और सुबह ढूँढने
जहाँ फिर वही भय वही डर
वही रस्सी....

और वही छह इंच का पेट
जो तुझे नहीं जीने देता
जीकर भी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

कविता-१२० : "मेरे अंदर का बच्चा..."


लाल नीले पीले गुलाबी 
गुब्बारों को देख कर

चूमने लगता है नीला आसमान..


लम्बी सी पूंछ की बड़ी सी पतंग
को देखकर उड़ते हुए
मन में हिलोर उठती है आज भी..

सावन में झूले, चकरी और लट्टू
चाभी वाली रेल गाड़ी भी
अहा ! 
आज भी मन जुदा है इनसे..

किसी ठेले पर बर्फ का गोला
और बुढ़िया के बाल..
कुल्फी के गाड़ी की टन टन टन
हम जैसे बड़े ही नहीं हुए...

पहली बारिश में मिटटी की
सोंधी सोंधी सी खुशबू
वो कच्ची डगर , नहर...
और पेड़ पर रस्सी का झूले...
कैसे हम भूले...

इन सबको याद कर आज भी
लगता है हंसने. कूदने
और मुस्कराने...
मेरे अन्दर का बच्चा...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________