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सोमवार, 11 मई 2015

कविता-१३९ : "तुलसी...."

तुलसी...

घर के आँगन से
लोगो के दिलो तक...

तू पूज्य रही और पावन
भी...

सदियों सदियों से तुमने
महकाया घर आँगन
और पूजी जाती रही तुम....

पर तुलसी अब कहाँ मिलती तुम
शहरो में आधुनिक बंगलो में
घरो में आंगनो में...

घरो के साथ शायद
मन / ह्रदय सभी लुप्त ही हो गई
क्यों न हो ?

सभ्यता संस्कृति और धर्म
के साथ ...
इन्सान भी तो लुप्त हो गया
आदमी के अन्दर से....

इस बदलाव ने बदल दिया
तुलसी का अस्तित्व
और अब आँगन में तुलसी
नहीं गुलाब है...

क्योकि आदमी के अन्दर दिखावे
का भाव है...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


रविवार, 10 मई 2015

कविता-१३८ : "माँ... मेरी माँ...."

सोचा...

माँ तू सागर जैसी है
पर सागर में उफान देखे है मैंने
और माँ तो उफानो से तूफानों
से रहित होती है...


फिर सोचा
माँ ,धरती जैसी है
पर हाल ही फटते देखा है मैंने
चीर धरती का
जो लील गया हजारो लोगो को...

फिर सोचा ...
माँ ,आकाश जैसी है
पर अन्तः आकाश की भी सीमा है
पर माँ तो असीम...

फिर तुलना कि मैंने कि
माँ फूल जैसी है
पर फूल भी मुरझा जाते एक दिन
और छोड़ देते महक
पर माँ की महक तो सदा ही...

फिर.....
माँ कैसी है ?

तभी माँ की और देखा
माँ मुस्कराई
तब जाना

माँ बिलकुल...
माँ के ही जैसी है____!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 9 मई 2015

कविता-१३७ : "सर्दी की रातें...."


बड़ी उलझी हुई सी वो
नहीं सुलझी हुई सी वो
है आलम तनहाइयो का
नहीं थी पास में वो....

कभी बेचेन करती थी
कभी आगोश में लेती
नहीं थी मेरी साँसों में
कभी बर्बाद सा करती....

उदासी सी छाती थी
कभी गिरते थे मेरे आंसू
नहीं कलम साथ भी देती
शिकायत जिन्दगी को थी...

नहीं मै भूल भी पाता
नहीं  मै पास भी पाऊ
शरारत जिन्दगी की ही..
ख्यालो में वो हरदम

बड़ी तड़प थी यारो
नशे में मेरी हालत सी
हाल ए मदहोशी में
एक शिकायत सी थी

बड़ी तन्हाई में गुजरी
उसका जिक्र उसकी बाते
नहीं मै भूलता यारो
वो सर्दी की राते...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 8 मई 2015

कविता-१३६ : "जिंदगी भर..."

सहता रहा जिन्दगी भर

कभी दुखी मन से
तो कभी हँस कर...

अफ़सोस न रहा जरा
सा भी
ख़ुशी पाई तो बस चुल्लू भर

तुम्हारी मुस्कराहट ही सब 
कुछ मेरा
जो मेरा वो सब तेरा....

हँसता रहा रोकर भी 
और रोता रहा खोकर भी....

चलता ही रहा शूलो में
रिश्तो भरे उसूलो में
तुम चुप तो मै चुप
तुमसे ही रहा
तुमसा ही कहा

हरदम
हरपल
हर क्षण ही
क्योकि......अनमोल

जिंदगी का जिन्दगी से ही
ये साथ छूट न जाये...
रिश्तो की डोर टूट न जाये... !!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 6 मई 2015

कविता-१३५ : "उनके आने से...."


उनके आने से...
मिलती है अनवरत खुशियाँ
खिल उठे जैसे कई कलियाँ
महक उठता है जैसे तन बदन
चहक उठती है साँसे
जैसे हो पक्छियों का मधुर गुंजन
ये प्यार ही तो है...
पर तुम कहोगे नहीं...
अब नहीं तो रहने दो.....

उनके आने से...
पा जाता हूँ सब कुछ
जैसे अम्बर अपना हो
देखता हूँ हर जगह तुम्ही को
सब कुछ सपना हो...
धरती जल नभ वायु सभी में
तुम ही तुम नजर आते हो
ये प्यार ही तो है
पर तुम कहोगे नहीं..
अब नहीं तो रहने दो.....

उनके आने से...
जिन्दगी भी गीत गाती है
हर पल तुम्हे ही बुलाती है
तुम जिन्दगी से प्यारे लगते हो
अब तो तुम भी कहोगे
शायद ये प्यार है.....

पर मै कहूँगा ये प्यार नहीं अब
बढ़कर है ये प्यार से भी
और जिन्दगी से भी
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 5 मई 2015

कविता-१३४ : "आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै..."

आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै
प्रेम करता हूँ...
इसके स्वरुप से...


तुम हां तुम..
मेरे मन से तन से
अन्दर से ,बाहर से
दैनिक ...भौतिक...दैविक
और सभी प्रकार से
खोजना
मेरी सभी बुराइयाँ
और करना विरोध
पर एक अनुरोध...


मेरी कुछ अच्छाइयाँ भी
गिन लेना
फिर करना प्रतिरोध
मै तुम्हारे साथ ही था
और साथ रहूँगा हमेशा ही
ध्यान रखना...
आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


सोमवार, 4 मई 2015

कविता-१३३ : "बुद्धत्व..."

बुद्ध को पाना आसान है

पर बुद्धत्व को पाना
उतना ही कठिन
जैसे
इंसान होना आसान
पर 
इंसानियत पाना
उतना ही कठिन
सच...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 3 मई 2015

कविता-१३२ : "जिंदगी का चिराग़..."


जिन्दगी का चिराग बुझ गया है 
आज साँसे रुक गई है...

धड़कने थम गई है
रुक गया है ये जीवन सागर
टूट गई ये माटी की गागर
माटी आज माटी में मिल गई...

आत्मा शरीर से निकल गई
भूत / वर्तमान
इतिहास बन गया...
भविष्य सिर्फ एक राख बन गया
आग की लपटे..
पंचतत्व की और जाने लगी
पिछला जीवन
पिछली यादें मिटाने लगी
यह कोई खेल नहीं...

प्रकृति का एक केवल...
एक ही सत्य है...
मौत है इसका नाम
इस पर...
मानव जाति का नहीं वश है...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


शनिवार, 2 मई 2015

कविता-१३१ : "सिंदूर..."


तेरी मांग में भरा था...
एक सिक्के से लाल सिंदूर
सिंदूर ही था...

कोई लक्ष्मण रेखा नहीं जो
बांधती तुझे हरदम
मर्यादाओ में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 1 मई 2015

कविता-१३० : "मजदूर या मजबूर..."



मजदूर________

तुम मजदूर हो या नहीं
तय करने का पैमाना नहीं
क्योकि...
काम तो सभी करते है
पर मेरे हिसाब से
मजदूर तुम मजबूर जरूर हो
और तुम्हारी मज़बूरी ने ही
मजदूर की संज्ञा दी होगी
विचारणीय ?

मजदूर.....
दूर भी है सुख सुविधाओ
और ऐशो आराम की जिंदगी से
 पर ये दूरी या मज़बूरी
मजदूर को पास भी करती है
और खास भी...

कितने निश्चिन्त होकर सो जाते
किसी भी पेड़ के नीचे
या हाँथ ठेले पर

ईधर तो लोगो को मखमली
गद्दे पर भी नींद चैन कहाँ
अब ?
तिजोरी जो भरी है
चोरी की आशंका
सोने नहीं देती......

सच रोटी वाले लोगों के पास
भूख नहीं
मजदूर भूखा है
रोटी को दौड़ता है
पसीना गिराता है
और पेट भर खाये या न खाए

बड़ा चैन आराम पाता है
मजदूर
दूर हो सकता है
पर पास भी तो है
और लोगो की तुलना में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कविता-१२९ : "और ख़ुदा मेरा...."


हो गये बहुत दिन अब...

लिखना ही होगा बेहतर
खुद के लिये और तुम्हारे लिये भी
क्योकि तुम दिल से होते हुए
आते हो दिमाग पर
और दिमाग से विचारो के संग
घुलकर अहसासों में आ बैठते हो
कलम पर....

और बहने लगते हो नीली स्याही संग
श्वेत कागज पर...

और उकेरे हुए आखरो में तुम्हारा चेहरा
जैसे सागर की लहरों पर
वक्त की उँगलियों के निशान....

सृजित हुए आखरो में जो
दिखता है.. वह ही होता होगा
कविता या कोई शब्द श्रंगार
पर मेरे लिये सिर्फ और सिर्फ
तुम... सिर्फ तुम ...

हां तुम ही.....
और तुम में मै खुद
और खुदा मेरा...!!!


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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________