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शनिवार, 16 मई 2015

कविता-१४४ : "मेरा प्रेम..."


लाल गुलाब की सुर्ख़ पत्तियो से
तेरे गेसुओं तक...

रश्मिरथी की आगाज से
निशा के आगोश तक...

ऊँचे पर्वत की चोटी से
सागर की गहराई तक...

पंछियो के कल्लोल से
पवन के नाद तक...

ढूँढा मैंने तुम्हे
पर न मिले .....

तभी लगी ठोकर और
गिरा जमी पर
सीने में धंसा एक पत्थर
जिससे निकले रक्त
की बूँद पर...

 अश्रु बहा रहा  था
मेरा 'प्रेम'...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 15 मई 2015

कविता-१४३ : "ये हो नही सकता..."


ये हो नहीं सकता कि
हो वो
जिसमे सम्भावना हो कहने की
शेष
कि हुआ नहीं ये...

ये हो नहीं सकता कि
हो सकता है कभी
न होने वाली क्रिया और कर्म
मेरे तुम्हारे बीच...

ये हो नहीं सकता कि
रहे कोई भी गुंजाईश
कि मुझसे तुम कहो या
तुमसे मैं कहूँ...

कि ये जमाना अब नहीं
कह रहा हम पर
 क्योकि लिख दी हमने
प्रीत इस ज़माने की छाती पर
और कहने और न कहने का
विषय कर दो बंद
सदा के लिए...

पर, ये हो नहीं सकता
और जो हो सकता है वही तो
कर रहा हूँ मैं...
देख लो...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 14 मई 2015

कविता-१४२ : 'में उब गया हूँ..."


मैं ऊब गया हूँ... 
रोज रोज

कागज की पीठ पर
कलम की नोक से खुजली 
करते करते...

रोज के रोज आखरों की
चित्रकारी
विराम पूर्ण विराम
और गणना मात्राओ की...

छंद गीत ग़ज़ल मुक्तक दोहे
और भी कुछ...
इन शब्दों के जाल में
मकड़ी सा 
फंसा / धंसा / और मर भी जाऊ
इन अक्षरो की सेज पर ही
शायद...

अब तो लिखूंगा अंतिम ही
पर कागज की छाती या पीठ पर
नहीं....
तुम्हारी कोमल देह पर
अधरों से शाश्वत कविता ही
और उंगलियो की तूलिका
रचेगी काव्य पिपुशा....

तब सृजित होगा
जिंदगी का महाकाव्य
फिर न कहूँगा कि
मैं ऊब गया हूँ
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 13 मई 2015

कविता-१४१ : "कैसे गुजरेगी ज़िन्दगी..."


तुम जो नहीं तो कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं तो
मै हूँ पर न होने जैसा ही
सच !

शून्य का धरातल ही है
भले ही मायने हो
जिन्दगी के , क्योकि
साँसों का संग्राम ही तो
जिन्दगी है लोगो की नजर में
पर इस नीरस जिन्दगी में
क्या है शेष ??

कुछ भी तो नहीं न
और जब तुम नहीं तो
कैसे गुजरेगी ये जिन्दगी
नहीं जानता मै ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 11 मई 2015

कविता-१४० : "विशाल वृक्ष की छाँव में..."

मैंने अपने हांथो से...
रौपा था नन्हा सा 
मिट्टी की छाती में
जन्म हुआ...
तब एक नन्हा सा बालक
दिखता था...

कुछ समय बाद वह कुछ और
बड़ा हुआ
तब मेरे साथ मुस्कराने लगा वह
अब तो मेरे काँधे बराबर हो गया
वह और एक मित्र की तरह
बाते करने लगा मुझसे
कुछ और बड़ा हुआ तो
मुझसे बड़ो की तरह प्यार 
करने लगा..

अब तो वह बूढा हो चुका है
उसके अनुभव उम्र की छाँव में
मै घंटो आराम करता हूँ
सच बहुत शीतलता महसूस
करता हूँ मै..
उस विशाल वृक्ष की छाँव में...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कविता-१३९ : "तुलसी...."

तुलसी...

घर के आँगन से
लोगो के दिलो तक...

तू पूज्य रही और पावन
भी...

सदियों सदियों से तुमने
महकाया घर आँगन
और पूजी जाती रही तुम....

पर तुलसी अब कहाँ मिलती तुम
शहरो में आधुनिक बंगलो में
घरो में आंगनो में...

घरो के साथ शायद
मन / ह्रदय सभी लुप्त ही हो गई
क्यों न हो ?

सभ्यता संस्कृति और धर्म
के साथ ...
इन्सान भी तो लुप्त हो गया
आदमी के अन्दर से....

इस बदलाव ने बदल दिया
तुलसी का अस्तित्व
और अब आँगन में तुलसी
नहीं गुलाब है...

क्योकि आदमी के अन्दर दिखावे
का भाव है...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


रविवार, 10 मई 2015

कविता-१३८ : "माँ... मेरी माँ...."

सोचा...

माँ तू सागर जैसी है
पर सागर में उफान देखे है मैंने
और माँ तो उफानो से तूफानों
से रहित होती है...


फिर सोचा
माँ ,धरती जैसी है
पर हाल ही फटते देखा है मैंने
चीर धरती का
जो लील गया हजारो लोगो को...

फिर सोचा ...
माँ ,आकाश जैसी है
पर अन्तः आकाश की भी सीमा है
पर माँ तो असीम...

फिर तुलना कि मैंने कि
माँ फूल जैसी है
पर फूल भी मुरझा जाते एक दिन
और छोड़ देते महक
पर माँ की महक तो सदा ही...

फिर.....
माँ कैसी है ?

तभी माँ की और देखा
माँ मुस्कराई
तब जाना

माँ बिलकुल...
माँ के ही जैसी है____!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 9 मई 2015

कविता-१३७ : "सर्दी की रातें...."


बड़ी उलझी हुई सी वो
नहीं सुलझी हुई सी वो
है आलम तनहाइयो का
नहीं थी पास में वो....

कभी बेचेन करती थी
कभी आगोश में लेती
नहीं थी मेरी साँसों में
कभी बर्बाद सा करती....

उदासी सी छाती थी
कभी गिरते थे मेरे आंसू
नहीं कलम साथ भी देती
शिकायत जिन्दगी को थी...

नहीं मै भूल भी पाता
नहीं  मै पास भी पाऊ
शरारत जिन्दगी की ही..
ख्यालो में वो हरदम

बड़ी तड़प थी यारो
नशे में मेरी हालत सी
हाल ए मदहोशी में
एक शिकायत सी थी

बड़ी तन्हाई में गुजरी
उसका जिक्र उसकी बाते
नहीं मै भूलता यारो
वो सर्दी की राते...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 8 मई 2015

कविता-१३६ : "जिंदगी भर..."

सहता रहा जिन्दगी भर

कभी दुखी मन से
तो कभी हँस कर...

अफ़सोस न रहा जरा
सा भी
ख़ुशी पाई तो बस चुल्लू भर

तुम्हारी मुस्कराहट ही सब 
कुछ मेरा
जो मेरा वो सब तेरा....

हँसता रहा रोकर भी 
और रोता रहा खोकर भी....

चलता ही रहा शूलो में
रिश्तो भरे उसूलो में
तुम चुप तो मै चुप
तुमसे ही रहा
तुमसा ही कहा

हरदम
हरपल
हर क्षण ही
क्योकि......अनमोल

जिंदगी का जिन्दगी से ही
ये साथ छूट न जाये...
रिश्तो की डोर टूट न जाये... !!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 6 मई 2015

कविता-१३५ : "उनके आने से...."


उनके आने से...
मिलती है अनवरत खुशियाँ
खिल उठे जैसे कई कलियाँ
महक उठता है जैसे तन बदन
चहक उठती है साँसे
जैसे हो पक्छियों का मधुर गुंजन
ये प्यार ही तो है...
पर तुम कहोगे नहीं...
अब नहीं तो रहने दो.....

उनके आने से...
पा जाता हूँ सब कुछ
जैसे अम्बर अपना हो
देखता हूँ हर जगह तुम्ही को
सब कुछ सपना हो...
धरती जल नभ वायु सभी में
तुम ही तुम नजर आते हो
ये प्यार ही तो है
पर तुम कहोगे नहीं..
अब नहीं तो रहने दो.....

उनके आने से...
जिन्दगी भी गीत गाती है
हर पल तुम्हे ही बुलाती है
तुम जिन्दगी से प्यारे लगते हो
अब तो तुम भी कहोगे
शायद ये प्यार है.....

पर मै कहूँगा ये प्यार नहीं अब
बढ़कर है ये प्यार से भी
और जिन्दगी से भी
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 5 मई 2015

कविता-१३४ : "आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै..."

आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै
प्रेम करता हूँ...
इसके स्वरुप से...


तुम हां तुम..
मेरे मन से तन से
अन्दर से ,बाहर से
दैनिक ...भौतिक...दैविक
और सभी प्रकार से
खोजना
मेरी सभी बुराइयाँ
और करना विरोध
पर एक अनुरोध...


मेरी कुछ अच्छाइयाँ भी
गिन लेना
फिर करना प्रतिरोध
मै तुम्हारे साथ ही था
और साथ रहूँगा हमेशा ही
ध्यान रखना...
आलोचना शब्द का भक्त हूँ मै...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


सोमवार, 4 मई 2015

कविता-१३३ : "बुद्धत्व..."

बुद्ध को पाना आसान है

पर बुद्धत्व को पाना
उतना ही कठिन
जैसे
इंसान होना आसान
पर 
इंसानियत पाना
उतना ही कठिन
सच...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________