गुरुवार, 26 मार्च 2015
बुधवार, 25 मार्च 2015
कविता-९२ : "तुम पुरुष हो...!!!"
तुम पुरुष हो
और कुछ पुरषो के
अन्दर
एक कापुरुष
जिसके अन्दर अहं
अभिमान और अश्लीलता
भरी है कूट कूट कर...
एक कापुरुष
जिसके अन्दर अहं
अभिमान और अश्लीलता
भरी है कूट कूट कर...
स्त्री का सम्मान सिर्फ माँ और बहिन
और पत्नि
के रिश्तो में ही शायद
और बाकि स्त्री
तुमसे सदैब ही असुरक्षित
क्योकि
तुम कापुरुष हो...
जिसके अन्दर का मिथ्या अहं
देता है पीड़ा स्त्री को
सदैव ही...!!!
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मंगलवार, 24 मार्च 2015
कविता-९१ : "किस तरह जिंदा रहूँ मैं...???"
तुम्हारी एक ना
ने
सब ही तो खत्म कर
दिया
अबशेष क्या अब
शेष
कि जिन्दा रहूँ
मैं...
भ्रम था लोगो कि
अच्छा
लिखता हूँ मैं
कैसे कहूँ कि
लिखवाती थी
तुम मुझसे
सदा...
खूब हँसता था
हंसाता था
अब वो मुस्कान
कहाँ
शेष
कि जिन्दा रहूँ
मैं...
कई राते जागकर
काटी
दिन तुम्हारे
इंतजार में
तुम नहीं तो फिर
ये दिन ये रात
कहाँ
शेष
कि जिन्दा रहूँ
मैं...
आज रवि भी नहीं
निकला
निशा भी न आगोश
भरती
पंछियो का नहीं
अब
कलरव शेष
कि जिन्दा रहूँ
मै...
माँ बाप के नेत्र
बूढ़े
ठहरे टूटी उम्मीद
पर
यादें तुम्हारी
सदा मुझको
जीने देती कहाँ...
तुम नहीं जो तो
मेरा खुद में
क्या शेष
कि जिन्दा रहूँ
मैं...!!!
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
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सोमवार, 23 मार्च 2015
कविता-९० : "सोच..."
कितनी आसानी से कह दिया
तुमने !
व्यर्थ बर्बाद करते हो तुम
समय अपना...
कागज कलम और शब्दों के संग
सब फालतू बर्बादी है ये...
हाँ...
शायद सही कह रहे हो तुम...
.
.
पर गलत भी, नहीं हूँ मै....
ये है फासला
सिर्फ सोच का....
तुमने !
व्यर्थ बर्बाद करते हो तुम
समय अपना...
कागज कलम और शब्दों के संग
सब फालतू बर्बादी है ये...
हाँ...
शायद सही कह रहे हो तुम...
.
.
पर गलत भी, नहीं हूँ मै....
ये है फासला
सिर्फ सोच का....
क्योकि...
सोच ही तो प्रथक करती है
इन्सान को
दूसरे इन्सान से...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
रविवार, 22 मार्च 2015
कविता-८९ : "आई पिल...है न..."
कल रात मुझसे भूल हो गई
देखा है
ये प्रचार टी
वी पर...
इसके आगे भी
कुछ है
ये कि
घबराइये नहीं
और
खाइये 'आईपिल' या
'अनवांटेड 48'
अनचाहे गर्भ से
छुटकारा...
ये तो हो गया
दवाई की
कंपनी का
प्रदर्शन
पर हकीकत में
सोचो
क्या ये भूल
औरत से ही हुई
जो वो ही खाये
ये दवाई
और गिरा दे
अपने ही अंश को...
पुरुष की भूल
कहाँ गई
अत्यन्त
विचारणीय ??
माना सहवास में
नर नारी
दोनों ही
समान..
पर वासना से
भरे पुरूष को
तब होश नहीं था
जब ये भूल हुई
होता भी कैसे ??
उस वक्त टी वी
में
अश्लील चलचित्र जो चल रहा
था
जब मुहल्ले के
मेडिकल स्टोर
खुले थे
कि ले आये
अनचाहे गर्भ
का बचाव
और ये भूल न हो
पाये....
पर, फर्क क्या
पड़ेगा
गर्म होते ही
शरीर दाग देंगे
गोली निशाने पर
औरत के सचेत
करने पर भी
और छूटते ही
पसीना
फट जायेगी...
कि
आ गया नया एक
और...
तो... कैसे होगी
परवरिश
कैसे आएगा
खर्चा पढाई का
और....दिखने
लगेगी भूल ...
तुरंत ही...
क्यों न दिखे
देह की गर्मी
जो ठण्ड पकड़ ली
और चलचित्र के बीच
बीच
में वो टी वी
में प्रचार
'आईपिल' / 'अनवांटेड-48'
भी तो याद है...
खून एक करो या
चार
फांसी तो एक ही
अस्सी रूपये की
गोली
लानी ही है
तो 47 घंटे और
सही
ये भूल...
औरत तो है ही
अपनी
भूल को सुधारने को और...
'आईपिल'... है न....!!
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_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
शनिवार, 21 मार्च 2015
कविता-८८ : "प्रेम की ही तरह..."
जाने ऐसा क्या है
तुम्हारे व्यवहार और नेह में
जो खींचता है मुझे
हर पल चुम्बक की तरह...
सच तो यही है के ये प्यार ही है
वो भी एकदम सच्चा वाला
लेकिन
तुम्हारा वही एक प्रश्न,
क्या तुम भी करते हो मुझे प्यार
और मेरा उत्तर,
हर बार की तरह निरुत्तर ,
और शायद रहेगा भी...
क्यूंकि ये प्रेम है
और प्रेम
शब्दों से बयां नहीं होता ना
मेरा प्रेम भी निश्छल है
तुम्हारे प्रेम की ही तरह...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________
शुक्रवार, 20 मार्च 2015
कविता-८७ : "जिंदगी...."
आज सोचा देखू जिंदगी
को
बड़ी खूबसूरत सी दिखी..
पहले पाषाण पाषाण
ही दिखता था
आज एक प्यारी सी मूरत सी दिखी...
आज सोचा देखूँ जिंदगी को..
बड़ी खूबसूरत सी दिखी...
मौत मौत ही है..
चंद धडकनों का बसेरा..
एक वीरान निशा अंधियारी सी
न शाम ना ही सबेरा...
जिंदगी जीकर देखी जियो
तुम भी
तब एक जरुरत सी दिखी....
आज सोचा देखूँ जिंदगी को
बड़ी खूबसूरत सी दिखी...
धड़कने बोझ दिखती थी
सांसो का रंग था ओझल..
पा ह्रदय के सुर को
हर कली खूबसूरत सी दिखी...
आज सोचा देखूँ जिंदगी को
बड़ी खूबसूरत सी दिखी..
हर प्यारी तस्वीर थी निहारी
रंगों पे फेरी थी आँखे..
बिन सिंदूर बिन
बिंदिया..
वो सुहागन बदसूरत
सी दिखी..
आज सोचा देखूं जिंदगी को
बड़ी खूबसूरत सी दिखी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________
गुरुवार, 19 मार्च 2015
कविता-८६ : "समाज तू है कौन ???"
समाज तू है कौन ?
मै, ये और वो...
और इस भीड़ में खड़ा
हर वो इन्सान भी जो
अपनी शर्ट की कॉलर पर
समाज का बिल्ला लगाये
चूर है अभिमान में...
मै, ये और वो...
और इस भीड़ में खड़ा
हर वो इन्सान भी जो
अपनी शर्ट की कॉलर पर
समाज का बिल्ला लगाये
चूर है अभिमान में...
बहुत सारे दिमाग
बहुत सारे
हाँथ पैर और शरीर...
झुंड ही है विचारो का...
हाँथ पैर और शरीर...
झुंड ही है विचारो का...
जो अपनी उर्जा से शक्ति से
नहीं रोक पाता अपराध शोषण
और हर पल प्रताड़ित हो रही नारी का
यौन शौषण...उत्पीडन..बलात्कार..
दो हाँथ दो पैर दो आँखे एक दिमाग
और एक कोमल देह ..
कभी खुद मर जाती है तो
कभी मार दी जाती है...
और ये विचारो.. लोगो का झुण्ड
समाज सिर्फ मौन
या थोडा सा प्रदर्शन
शब्द बाण... संवेदनायें...
पर हांसिल होता उससे
लगभग शून्य ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________
बुधवार, 18 मार्च 2015
सुर-८५ : "मुस्कराता हुआ चेहरा..."
भीतर के अंधेरों में
गोल गोल घेरो में...
तुम्हारा सांस
लेता नन्हा शरीर
आसपास...
मानव शरीर अंग कोशिकाये...
उत्तक रक्त वाहिकाये...
ही पडौसी रहे होंगे तुम्हारे...
मित्रता भी की होगी
तुमने इन सबसे...
नौ मास का लम्बा समय
एक काल कोठरी में
भीतर बिताया है तुमने..
पता नहीं
बहार की बारिश की बूंदों की
आवाज..
सुनाई देती थी तुम्हे या नहीं..
पर !
माँ की साँसों से उसकी
अथाह
ममता से...प्यार से...
तुम्हे मिलता जरुर होगा..
एक अहसास बेहद सुखद..
जो तुम्हारी पलकों को
कराता होगा इंतजार..
बाहर धरा पर आने का..
और देखने का..
अपनी जननी माँ का
मुस्कराता हुआ चेहरा...!!!
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________
मंगलवार, 17 मार्च 2015
कविता-८४ : "लकड़ी का स्वाभिमान..."
काट रहा था
उसे नापकर छीलकर
तराश रहा था
तभी वह लकड़ी शिल्पकार के हाँथ
से खिसकी
जमीं पर गिरकर तेजी से सिसकी
वह रोते हुए शिल्पी से बोली
बड़े जोर लगाकर अपने बंद होंठो
को खोली...
हे शिल्पी... हे शिल्पी...
मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है
जो तू मेरे पीछे पड़ा है
अरे तू मुझे क्यों काटता है
क्यों ?
मेरे बदन से मेरी खाल को
खरोंचता है
और फिर मुझे कुछ बनाकर
बाज़ार में बेंचता है...
अरे हमारी तुमसे क्या बुराई है
जो पूरे काठशिल्पियो की गुस्सा
हम पर उतर आई है
इतना कह लकड़ी ने तेजी से
रोना शुरू किया...
इसको देख
उस शिल्पी का भर आया
जिया
वह बोला हे लकड़ी
मेरी तुमसे कोई बुराई नहीं
परन्तु पैसो के कारण तुझे
काटना पड़ता है
पेट के कारण तुझे तराशना पड़ता है
और तुझे बेंचकर ही तो
मेरे बच्चो का पेट भरता है...
तब वह लकड़ी बोली
अगर मै तुम्हारे पेट के लिये कटती हूँ
तो यह बड़े सम्मान की बात है
खुद कटकर दूसरो का पेट भरूँ
इससे ऊँची हुई हमारी जात है
परंतु हमारा भी कुछ स्वाभिमान है
इस देश में कुछ तो नाम
है
अगर हो सके तो एक अहसान कर देना
इस समाज में कुछ तो नाम रख देना...
तब वह शिल्पी बोला-
कहो क्या अभिलाषा है तुम्हारी
मुझसे क्या आशा है तुम्हारी...
लकडी बोली-
तुम मुझे जितना छीलते हो उससे अधिक छीलो
जितना काटते थे
उससे अधिक काटना
परन्तु !
मुझे एक सुन्दर सी आकृति दे
कुछ अच्छा सा बनाना...
तब वह शिल्पी बोला-
ये अच्छी बात है
मै तुम्हारी इक्छा पूरी कराता हूँ
और तुम्हे एक सुन्दर सी कुर्सी बनाता हूँ...
तब वह लकड़ी बोली
ऐसा अनर्थ मत करना
कुर्सी बनाकर मेरी जाति को
कलंकित मत करना
अरे कुर्सी के कारण ही तो
आज देश में दंगे फसाद हो रहे हैं
और नेता तो इसके असीम भक्त हो रहे है
यह कुर्सी या तो किसी विद्यार्थी द्वारा
स्कूल या कॉलेज में फेंकी जायेगी
या लोकसभा या विधान सभा में
नेताओ द्वारा उछाली जायेगी
या इस पर वैठ कर कोई गद्दारी करेगा
तो फिर मेरा मन कैसे लगेगा
अतः तुम मुझे कुर्सी न बनाओ
कोई और आकार दे
किसी और प्रकार से सजाओ...
तब वह शिल्पी बोला-
चलो ये छोड़ देता हूँ
तुझे अलमारी या पेटी बनाता हूँ...
तब वह लकड़ी पहले सोची
फिर बोली
हे शिल्पी तुम मुझे अलमारी या पेटी
भी न बनाना
क्योकि आजकल लक्ष्मी का दीवाना है
सारा जमाना
और अगर कोई दो नंबर या काला बाजारी
का पैसा मुझमे रखेगा
तो मेरा मन मुझे देश द्रोही कहेगा...
तब वह शिल्पी बोला
चलो ये भी ठीक है
मै तुझे कुर्सी अलमारी और पेटी छोड़ देता हूँ
तुझे कोई दूसरा आकार देता हूँ
तुझे किसी खिलाडी की हॉकी या बेट
बनाता हूँ
अगर देश जीतेगा तो तेरा भी नाम होगा...
यह सुन लकड़ी की आत्मा फिर डोली
वह दुःख पूर्वक बोली
मुझे किसी खिलाडी के हाँथ नहीं जाना
यदि उस खिलाडी ने मैच फिक्सिंग की
और देश हारेगा
तो पूरा देश हमे फिर देश द्रोही कहेगा...
तब वह शिल्पी बोला
मै क्या करूँ
तुझे कैसे बनाना शुरू करूँ
मुझे कुछ समझ नहीं आता
तुम्ही बताओ
मुझे कोई राह दिखाओ...
तब वह लकड़ी बोली-
शिल्पकार की आँखे खोली
तुम मुझे न कुर्सी न पेटी
न हॉकी और न बेट बनाओ
मुझे बस एक सीधी सी छड़ी का आकार
दे किसी अंधे बुजुर्ग या बेसहारे
के हाँथ में थमाओ...
किसी अंधे बुजुर्ग या बेसहारे के
हाँथ का सहारा बनूँगी
तो अपने व अपनी जाति को जिन्दगी
भर धन्य समझूंगी...!!!
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