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मंगलवार, 9 जून 2015

कविता-१६८ : "कैसे कह दूँ...???"


बताना होगा तुमको ही आज

कर लो कुछ भी
पर...



ये रोज के रोज की घंटो बाते
रूठना झगड़ना
और भी कुछ अनकहा सा...


चिंता रहती है तुम्हे
मेरी खुद से भी ज्यादा...


और पूछो तो वही रटा पिटा
सा जवाब
कि नहीं है प्यार तुमसे...


मत कहो 
बिलकुल न कहो
पर,

ये बता दो कि
कैसे कह दू 
मैं कि मुझे तुमसे है
प्यार बहुत
सच...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 8 जून 2015

कविता-१६७ : "मेरे अहसास बहरे..."


तेरे ह्रदय की पीर
गर सुन पाता
तो पीर फिर
कहाँ रह जाती...

नहीं सुन पाता हूँ
शव्द पीड़ा के
क्योकि...

तुम्हारी मुहब्बत
है गूंगी
और मेरे अहसास
शायद बहरे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


रविवार, 7 जून 2015

कविता - १६६ : "तुम कौन हो ???"


कौन हो तुम???


और क्यों आई अचानक से
कहाँ थी अब तक ?

रात को सोया था तब
तुम नहीं थी पास
हर रात की तरह अकेला था
कलम के साथ ही...

पर, आज नींद खुलते ही
साथ हो तुम
मौसम भी सुहाना सा है
फूल कुछ ज्यादा ही रंगीन है
कुछ तो बदला है
शायद...
नजरिया बदला हो मेरा
या आँखे ही
ये आवाज कैसी
तुम्हे प्यार करती हूँ मैं...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 6 जून 2015

कविता-१६५ : "नजर उसकी जी कातिल है..."

सच इन्ही नजरो ने
नजर को मेरी
तुम्हारी नजरो के साथ ही
दूर किनारे उस पनघट के
उड़ा ले गई थी जहाँ
लगा है एक उम्मीद का बड़ा
सा वृक्ष...

लोग प्रेम भी कहते है इसे
इस छायादार पेड़ के
नीचे ही लिख रहा हूँ आराम से
तुम पर ,तुम्हारी नजरो के सामने
क्योकि...

नजरे तुम्हारी कातिल जो है
है न...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 5 जून 2015

कविता-१६४ : "कैसी ये उलझन हैं ???"


जिन्दगी की रेत पर
वक्त की उँगलियों के निशान...

कुछ कम गहरे भी
और कुछ कम ठहरे भी...

ये निशान मिटाना भी नहीं चाहता
और दबाना भी...
कैसी ये उलझन है....??

ओह !
ये हवाये क्यों चली अचानक
और ये लहरे कैसी ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 4 जून 2015

कविता - १६३ "कुछ कहूँ तो शिकायत होगी..."


चुप हूँ मै जान कर भी
और चुप ही रहूँगा सदा....

जानता हूँ ,
बेबफा तुम, हमदम नहीं अब
साथ हो

बदले जो तुम अब
मेरे कहाँ हो
कल तक ही मेरे साथ थे

आते हो अब भी जताते हो अब भी
पर है हकीकत
सिर्फ दिखावा ही है वो

कहता नहीं मै
रहता हूँ चुप जो
क्योकि...
 कुछ कहूँ तो तुमको शिकायत होगी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 3 जून 2015

कविता-१६२ : "कहाँ जायेगी ये डगर...???"


कहाँ जायेगी ये डगर...

गर पता होता
तो चला न जाता...

पर रुकने से भी फायदा
क्या ?

चलते चलते..और फिसलते
संभलते...फिर और चलते
बढ़ता जाऊंगा

देखकर सूरज , पाने उसे
फिर शायद
गिरूंगा जमी पर और
हो जाऊंगा खत्म...

पर  डगर तो डगर है
कहाँ होगी खत्म
नहीं पता
जायेगी कहाँ ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


मंगलवार, 2 जून 2015

कविता-१६१ : "प्रेम..."


मेरे प्रेम
उड़ रहा तू नील गगन में

जहाँ तक नहीं पहुँचते
मेरे हाँथ
तेरे पैर पकड़ने...

स्वतंत्र तू चिड़िया के 
माफिक...

मैं धरा पर बोझ हूँ...

काश... 
होते पंख मेरे 
तो उड़ता संग तेरे
हौले-हौले...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 1 जून 2015

कविता-१६० " कहाँ हो तुम...???"


हो क्या ?

तुम वहां पर
उन काली आकृतियो की ओट में
जिसे कुरेदा था
कागज पर, लेखनी से मैंने...
हो क्या तुम, वहां पर...
नील गगन में उन बादलो के पीछे
या ऊपर
क्योकि दिखे तो नहीं
पर उनमे एक झलक दिखी थी
तुम्हारी.....
हो क्या तुम, वहां पर...
समुद्र के नीचे
अनंत गहराई में छिपे 
सीप के अंदर ही
मोतियों के संग...
हो क्या तुम , वहां पर
जहाँ से ये हवा छूकर तुम्हे
महकती है सदा ही....
और खुशबू देती है
मुझे....
हो क्या तुम , वहां पर ही
जहाँ से सांस लेता हूँ
मैं...
बताओ न अब
कहाँ हो तुम...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 31 मई 2015

कविता-१५९ : "आज़ाद हो तुम..."


हैं तो आजाद...
 हम और तुम भी..
मानसिक , शारीरिक  और
अधिकारिक रूप से...

 सोचने की ...करने की....
घूमने की फिरने की
कहने की सुनने की
नियमो के बुनने को...

लिखने की ..पढने की
किसी से भी लड़ने की...

संस्कारो को निभाने को
मिटने की मिटाने की...

सत्ता के जूनून की
सडको के खून की
बच्चे पर अत्याचार की
नारी के बलात्कार की.....

आजादी तो ही है...
बोलो है न आजादी....

बोलो क्यों मौन हो अब
आजाद हो तुम भी
कहने के लिये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 30 मई 2015

कविता-१५८ : "झूठ ठहरता कहाँ ???"


तू ठहर जरा...

ठहर.....



रुक ...सुन.....और देख
अपनी तीन उँगलियाँ
तेरी तरफ ही हैं 
उठाई थी जो एक ऊँगली मुझपर
ठहर सुनो अपने आस पास की
और आवाजो को भी
तेरे प्रतिरोध के स्वर से तेज से है
मेरे समर्थन का नाद...

ठहर तू अब ठहर ही जा
और देख मेरे साथ
आज भी वो हैं जिनके बीच
षड़यंत्र का जाल फेंका था 
मुझे उनसे पृथक करने...

ठहर और ठहर 
अभी तो और बाकि है 
न्याय की कहानी...
ठहरता क्यों नहीं अब ?
क्योकि जानता है तू
गलत है...
और जब गलत है तो
ठहरेगा कैसे???

सच की सपाट सतह पर
झूठ ठहरता है कहाँ...???

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


शुक्रवार, 29 मई 2015

कविता-१५७ : "जिंदा रहूँ में..."






तुम्हारी एक ना ने

सब ही तो खत्म कर दिया
अबशेष क्या अब 
शेष
कि जिन्दा रहूँ मैं....

भ्रम था लोगो कि अच्छा
लिखता हूँ मैं
कैसे कहूँ कि लिखवाती थी
तुम मुझसे सदा....

खूब हँसता था हंसाता था
अब वो मुस्कान कहाँ
शेष
कि जिन्दा रहूँ मैं...

कई राते जागकर काटी
दिन तुम्हारे इंतजार में
तुम नहीं तो फिर
ये दिन ये रात कहाँ
शेष
कि जिन्दा रहूँ मैं...

आज रवि भी नहीं निकला
निशा भी न आगोश भरती
पंछियो का नहीं अब
कलरव शेष 
कि जिन्दा रहूँ मै...

माँ बाप के नेत्र बूढ़े
ठहरे टूटी उम्मीद पर
यादें तुम्हारी सदा मुझको
जीने देती कहाँ...

तुम नहीं जो तो
मेरा खुद में क्या शेष 
कि जिन्दा रहूँ मैं...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 28 मई 2015

कविता-१५६ : "ये कैसा दर्द है..."

कह नहीं पा रहा जैसे सदियो से

दबे कुछ अनकहे आखर
हृदय के अंतिम कोने में
उन आखरों के भीतर
भी बहुत कुछ है 
जैसे इस सुर्ख धरा के
भीतर भी...
भले ये आखर निर्जीव हो
पर...
जीवटता बहुत है इनमे
कि कलम से लिखने
पर भी लिखते है तुम्हे ही
ये सजीवता ही है

पर, तुम्हे लिख देने से
मेरी अविरल यात्रा का पड़ाव
ठहरता कहाँ
क्योकि
मैं और मेरी कलम
नहीं लिख पाते मुझे
तुम्हारे साथ...

फिर
ये आखर और गर्म हो जाते है
लावे की तरह
और एक सीमा उपरांत
वो आखर 
उनका संवेग खो देता है
जीवटता
फिर शायद
कविता बन जाती है
सच
कैसा दर्द है ये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 27 मई 2015

कविता-१५५ : "नया प्रयोग कविता में..."

जहाँ तक काव्य को मैंने जाना है कविता एक प्रवाह के साथ चलती है। एक उचित क्रम और अभिव्यक्ति ही कविता को पूर्णता देते है।
इस कविता में एक नया प्रयोग है जिसे आप पढ़कर मेहसूस करेंगे।


इसे पहले आप ऊपर की पंक्ति से नीचे की पंक्ति तक पढ़े।
फिर नीचे की पंक्ति से ऊपर की पंक्ति तक पढ़े।





वो मर गया...

आत्महत्या की थी उसने

बेबफाई हुई थी उसके साथ

प्यार भी बेपनाह किया था

खूब आँखे मिलाता था
देखता था छिप छिप कर

थी बहुत,
उम्र के नाजुक दौर में
'मिलन की आस'
एक किशोर लड़के को...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 26 मई 2015

कविता-१५४ : "उनकी नजर से..."


भीड़ की धुन्ध में 

सब.. हाँ.. सब
कहाँ ,सबके लिये...

पर जो है जिनके लिए
वो ,कहाँ बच पाता
उनकी नजर से...

ये शब्द भी कहाँ बचने वाले
अब उनकी और
तुम्हारी नजर से.....
देख लेना...
सच...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 25 मई 2015

कविता-१५३ : "आओ न..."

सुनो...

आ जाओ अब करीब मेरे
जल्दी ही...

कानो में घोल दो अपनी
आवाज का संगीत मीठा
और छूकर एक बार
दे दो वो अहसास
जिसे पाकर ही हुआ था मै
तुम्हारा.... 
सिर्फ तुम्हारा ही...

ये राते ये दिन ये समय 
पलक पांवड़े बिछाए
प्रतीक्षारत है 
आज भी....

आ जाओ अब ..
ये बेचेनियाँ , उदासिया
तनहाइयाँ
बदले बेबफाई में.
पहले इसके दिखा जाओ
वफा अपनी...

और आओगे भी न क्यों
आखिर कब तक ???

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 24 मई 2015

कविता-१५२ : "विरह..."


ये कैसा विरह है तुमसे कि


विरह पश्चात
और नजदीक हूँ तुम्हारे
दैहिक नहीं किन्तु आत्मिक
सच...

पथराई आँखों की सुकड़ी
डिम्बियां अब नम है
तरलता भी आवश्यक है जीने हेतु
मान ही लिया मैंने...

दुनिया के छोर में तुम तो हो
पर मेरी ओर नहीं अब

ये तुम भी जान लो
और देख लो


मैं तो जी लूंगा लिखकर
कविताये
तुम पर ही...

पर सोचता हूँ तुम लौट न आओ
विरह की तपिश में
मिलन की बरसात लिए...

सुना है किसी से
मेरी कविताये खींच लेती है
प्रेम को...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________