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गुरुवार, 25 जून 2015

कविता-१८२ : "याद..."



हम

आते
है...

और !
हम
चले 
जाते
है...

पर !
जाने
वाले...

न 
वापिस
आते
है...

और
बहुत
याद
आते 
है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 24 जून 2015

कविता - १८१ : "संतान की अभिलाषा..."

भीतर के अंधेरों में

गोल गोल घेरो में...
तुम्हारा, सांस लेता नन्हा शरीर
आसपास....
मानव शरीर अंग, कोशिकाये..
उत्तक, रक्त वाहिकाये..
ही पडौसी रहे होंगे तुम्हारे...
मित्रता भी की होगी 
तुमने इन सबसे...
नौ मास का लम्बा समय
एक काल कोठरी में
भीतर बिताया है तुमने..
पता नहीं ??
बहार की बारिश की बूंदों की 
आवाज..
सुनाई देती थी तुम्हे या नहीं..
पर !
माँ की साँसों से, उसकी अथाह 
ममता से...प्यार से...
तुम्हे मिलता जरुर होगा..
एक अहसास बेहद सुखद..
जो तुम्हारी पलकों को 
कराता होगा इंतजार..
बाहर धरा पर आने का..
और देखने का..
अपनी जननी माँ का
मुस्कराता हुआ चेहरा...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 23 जून 2015

कविता-१८० : "मेरे तुम्हारे... सारे सच..."


वियुक्त हो मुझसे मनन किया होगा तुमने 

किंचित क्षुब्ध होउंगा तुम बिन मैं 
या पीड़ा होगी मुझे विरह की 
अट्टहास....यह मात्र भ्रम है तुम्हारा 
और क्षोभ है मुझे 
कि यही भ्रम तुम्हे जीवन की ऊर्जा प्रदान करता है 
तब से अब तक 
जब भ्रम था मुझे 
अभिन्न होने का तुमसे 
भ्रम था मुझे जब 
तुम कभी मुझे नहीं करोगी 
परिचित अश्रुओं से 
कुछ दिन साथ चले थे जीवन-पथ पर 
तब भ्रम था 
आजन्म संयुक्ति का 
देवरूप के सम्मुख 
सौगंध ली थी हमने 
भ्रम था 
आमरण उस सौगंध पर टिके रहने की 
भ्रम था 
उनके निभ जाने का 
सूची लम्बी है 
भ्रमों की 
और गहरी है तन्द्रा 
मिथ्या प्रतीति की 
तुम पढना 
मेरा यह आलेख 
तब छंटेगा 
भ्रम का अभिमाद 
यथार्थ की भोर होते ही 
तुम्हारी उनींदी आँखें 
जब गुजरेंगी 
मेरे मुस्कुराते चेहरे से 
उन्हें भान होगा 
भ्रम के पीछे छुपे 
मेरे सच्चे चेहरे से 
जो तुमसे बता देंगी 
सारे सच 
मेरे-तुम्हारे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 22 जून 2015

कविता-१७९ : "तुम-सा होना..."

समुद्र की गहराई पर लिखना
या लिखना समुद्र की लहरों पर

समुद्र हो जाना है क्या ??

जब नहीं तो...
तुम पर लिखकर
तुम सा कैसे..
हो सकता हूँ मै...???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 21 जून 2015

कविता-१७८ : "मिटटी की आवाज़..."


ख़ुशबू मिट्टी की उपजी धरती से

गंध पहुंची सीधे अंतस तक
आनंद बिभोर होता हुआ मन
मयूर की तरह...

जैसे सावन में झूमता है मयूर
ठीक वैसे भी मन मयूर
झूमता मिट्टी की खुशबू में...
सूँघने के साथ आज मैंने
सुनी भी...

मिट्टी की मधुर आवाज..
जो थी बिलकुल मिट्टी की
ही तरह...
सोंधी सोंधी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 20 जून 2015

कविता-१७७ : "तुम और मैं..."


मै हूँ , तुम हो...

और नहीं कोई....

जब..
मै में मै हूँ 
तुममे तुम...

और...

तुममे मै हूँ
मै में तुम...
तब...

कोई कहाँ
रह जाता है 
शेष ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 19 जून 2015

सुर-१७६ : "शर्त और जिंदगी..."

शर्तो पर रखी जिन्दगी

शर्तो जैसी ही होती है..
दम तोडती सी... 
साँसे छोडती सी...
काश !
जिन्दगी ने रखी होती
शर्त...
शर्त न लगाने की तो
शायद...
जिन्दगी होती फिर
जिन्दगी के अहसास सी..
कुछ खास सी....
अखिल 
एक ख्याल यूँ ही ....
बस अभी अभी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 18 जून 2015

कविता-१७५ : "दे दो ना..."

तुम वो शब्द मुझे दे दो....

जिसमे लिख दूं मै समेटकर
उसकी पीड़ा इसका दर्द 
और तुम्हारी जरुरत....


मेरा छोड़ दो, मेरा कुछ नहीं...
क्या लिखूंगा अपना
भला शून्य जो हूँ मै......

तुम तो बस वो शब्द मुझे दे दो
अब दे ही दो ना...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 17 जून 2015

कविता-१७४ : "तुमसे मैं... मुझसे तुम..."


मेरी परेशानी पर हंसा देते थे तुम

पर तुम्हारी परेशानी पर
तुम क्यों नहीं हँसते क्यों नहीं हंसाते
जबकि जानते हो कि
तुम जो रहोगे परेशांन तो मै भी
कहाँ ठहरती है मुस्कान 
मेरे चेहरे पर...

ये परस्पर संबंधो की प्रगाढ़ता ही है
और हमारी अंतरंगता जन्मो की
कि तुमसे तो ही मै हूँ
और मुझसे ही तुम...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 16 जून 2015

कविता-१७३ : "इंसानियत..."

मै ईश्वर पर यकीं नहीं करता ज्यादा

न ही उसके चमत्कारों अवतारों पर
प्रार्थनाये धार्मिक क्रिया कांड
सब शून्य ही है मेरे अन्दर
नहीं झुकता आसानी से शीश मेरा
देव आलयो और पत्थरो के आंगे
पर एक चीज एक बात जो
हरदम झुका देती है 
सर्वस्व मेरा लुटा देती है
वह है इन्सानियत...

और ये इंसानियत / मानव सेवा
ही दिलाती है मेरा धर्म
मेरी प्रार्थना और मेरा
ईश्वर...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 15 जून 2015

कविता-१७४ : "तेरा साथ... 13-7 "

ये तारीखे भी आती है

चली जाती है.....

पर कुछ तारीख जेहन में 
उतर जाती है..
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे 
नर्म हांथो पर रंग मेहँदी का...

अब आज की तारीख ही देख लो
13-7 तेरा सात...
कैलेंडर में दिखता है चेहरा तेरा ही..

और साथ तो है ही वर्ना
क्यों दिखता तेरा चेहरा 
कागज के कैलेंडर में / तारीख में
लेकिन बदलेगी ये तारीख कल
एक समय के बाद...

पर नहीं बदलेगा हमारा प्यार
आज की तारीख की तरह...
जीवन भर ही रहेगा
तेरा साथ 13-7...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 14 जून 2015

कविता-१७३ : "जमीं से उठकर किया प्यार...!!!"


तुम्हारी जो लम्बी सी गर्दन है ना
सुराही जैसी...

उस पर ठहरी थी बारिश की एक बूँद
जो तुम्हारे लहलहाते हुए गेसुओ से
उतर कर आ गिरी थी..

और नीचे आती और गिरती जमी पर
पहले इससे ही..
अधरों से मिला लिया जिव्हा रस में
मैंने...

नहीं गिर पाई वो स्पर्शित बूँद 
तुन्हारे बदन से जमी पर...

क्योकि जमी से उठकर ही तो
प्यार किया है
हमने और तुमने..
है ना...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 13 जून 2015

कविता-१७२ : "आंसू की बूंद..."

आँसू की बूँद...

कहाँ ढूँढ रहे हो वहां
जहाँ बूँद तो क्या कतरा भी 
नहीं मिलेगा...
सबके पास नहीं होती ये बूंदे
होकर भी...

दर्द अहसास संवेदना ही बनाती है
इन्हें मिलकर
इसलिये होती है ये खारी 
शायद...

चलो उस बस्ती में बुढिया के घर
देखो उसकी बेटी और बेटो को
फिर देखना बुढिया की चेहरे की
लकीरों को...

उसके जवान बेटी के अधफटे कपड़ो को....
उसके बच्चे के भूखे पेट को....
आँसू की बूंदे तो क्या
बाढ़ देखने को मिलेगी इस खारे
पानी की...

तब टूटेगा भ्रम तुम्हारा कि
ये बूंदे सिर्फ आँख में रहती है
इसके बाद भी लगे तो आ जाना
इन बूंदों की सुनामी दिखाऊंगा
यही कहीं...

खोल लेना मेरी कलम का
ढक्कन पीछे से 
लेकिन संभल कर.... 
इससे निकलने वाली 
आसुंओं की बूंदों में 
सच्चा इंसान डूब भी सकता है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 12 जून 2015

कविता-१७१ : "मुझमें सिवा मेरे..."


तनहाइयो भरी शाम में
दर्द और थकान में...

उलझ गया हूँ गुत्थियों में
सुलझने की चाह में...

वक्त का कसूर ये
लकीरों का दस्तूर ये
नाकामी ही जीत अब
हार के मैदान में...

तू जो गर न पास है
फिर क्या है शेष अब
सिवा मेरे सिवा तेरे
मुझमे... सिवा मेरे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 11 जून 2015

कविता-१७० : "वजह... बेवजह..."


मिलना तुमसे...

वजह थी


तेरे संग संग चलना
ये भी वजह


तुमसे अथाह प्रेम

वजह ही...

अपना रिश्तो का वजूद

वजह से ही....

पर तुम्हारा मौन

तुम्हारी जुदाई...

या यूँ कहे साफ़ साफ़
बेवफाई 
तुम्हारी
बेबजह...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 10 जून 2015

कविता-१६९ : "मेरे तुम्हारे बीच..."


मेरे तुम्हारे बीच...

सम्भावनाये कहाँ है शेष
औरो की तरह...

प्यार तकरार सच झूठ
और दुनिया की झूटी रस्मो
रिवाजो से
बहुत ऊपर हो चुके तुम और मै...

मॉस की पिंडलो से बने शरीर
अलग अलग जरुर हैं
पर आत्माये तो एक ही..

जब दो होकर भी हो गये
एक ही तो
क्या बचा ?
मेरे तुम्हारे बीच
सिर्फ हम और हमारी
जिन्दगी
है न...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________