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बुधवार, 12 अगस्त 2015

कविता-२३० : "यादों का तकिया..."

 तकिया...
आराम देता देह को
विश्राम अवस्था में
अंदर भरी हुई नर्म रुई कपास
की कोमलता
सुर्ख त्वचा को देता
सुखद अहसास....
पर कुछ दिनों से , सच__
तुम्हारे विरह की पीड़ादायक
यादे घूमती रहती
दिलो दिमाग में
त्वचा के रोम छिद्रो से
निष्काषित होती
हुई
निश्चित ही विश्राम के
आराम को
कोहराम में बदलती है
नर्म मुलायम
तकिया भी
दर्द के आंसुओ से भीगकर
पत्थर सा कठोर
यादो का तकिया
बनकर
मस्तिष्क के नीचे होकर
भी
मष्तिष्क के ऊपर के
वेग को
बढ़ा देता
फिर ये देह कहाँ सो पाती
सोकर भी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

कविता-२२९ : "जिंदगी ख्वाबों से नहीं चलती..."

अगर____
चलती होती जिन्दगी ख्वाब से
तो दुनिया की
तस्वीर ही अलग होती
न कोई होता
भिखारी
न होता कोई रंक
हर तरह होते आलीशान बंगले
सोने के महल
गरीबी गरीव की झोपडी
सिर्फ मिली इतिहास
के पन्नों में
मौत भी न होती
गम भी न होते
ख्वाब देखने से ही गर हो
पाते सारे अरमान पुरे
पर
सच तो सच है
और
जिसमे ख्वाबो की
गुंजाईश कहाँ...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 10 अगस्त 2015

कविता-२२८ : "तुम बिल्कुल मेरे जैसे हो..."

तुम बिलकुल मेरे जैसे हो
इस वाक्य में स्वार्थ दिखता है
मुझे...

विषम लिंगीय चैट और चर्चा
के दौरान
मिलन के प्रारंभिक दौर में
कई बार सामने वाले की
आदतो को सुनकर
कहा जाता यह वाक्य कि
तुम बिलकुल मेरे जैसे हो
इसी आशा के साथ
कि...
इसे कहते ही मिलेगा जवाब
मुस्काते हुए कि
फिर खूब जमेगी हमारी
मित्रता पक्की आज से
पर
क्या कभी कोई किसी के
जैसा....
हो सकता है ??
काश हो सकता तो
हम बहुत कुछ न खोते
खोकर भी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 9 अगस्त 2015

कविता-२२७ : "दिल रेजा-रेजा जलता हैं..."

कही खुशियां देती घर पर
दस्तक
कही , अरमान कहीं कोई
ढलता है__
साँसों का संगीत कही है
कहीं
ख़ूनी तांडव चलता है
उगने से आती है किरणे
तो कही
हर और सूरज ढलता है
ठहराव कहीं भी होता
किन्तु
भूचाल कही भी चलता है
बेबस रोटी और बिलखती
साँसों से खिलवाड़
हुआ जब
तय मानो ये यारो
दिल रेजा रेजा जलता है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 8 अगस्त 2015

कविता-२२६ : "यादों की छतरी..."

भरकम बारिश के आगोश में
पैदल इंसान
को बचा लेती छतरी
तर बतर भीगने से…
उसकी यादों की
बारिश ने भी
जिन्दगी का मार्ग बाधित किया
जो चलने तो ठीक
हिलने भी नहीं देती
काश !
कोई छतरी होती यादो की भी
जो बचा लेती मुझे
भीगने से
तेरे विरह के नीर से…
काश…!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

पोस्ट-२२५ : "व्हाट्स एप्प में बनी छंदमुक्त पाठशाला... लाई साहित्य रस से भरी भावों की हाला..."


सपनो को हकीकत में बदलते देखना बहुत ही सुखद अहसास होता है... 
और सच आज मेरा एक दीर्घ स्वप्न जो हकीकत में बदला.....

'व्हाट्स एप्प' पर आज ही दिन एक साहित्यिक समूह छंद मुक्त पाठशाला कुछ मित्रो के साथ बनाया था, काव्य प्रहरियों से सजी ये पाठशाला सदैव ही उपलब्धियों से भरी रही...व्हाट्स एप्प केअनेको समूहों में रहा ..समूहों में राजनीति देखी ,विवाद देखे पर इस पाठशाला रूपी परिवार में सदस्यों का आपसी नेह देखते ही बनता है।

कुछ मास पूर्व एक दिन अनायास ही मुख से निकल गया क्यों न पाठशाला के रचनाकारों की रचनाओ की किताब आये..बस फिर क्या था ..माँ शारदे की कृपा मित्रो का सहयोग और अथाह साहित्य प्रेम ने तैयारी कर दी शब्दों को पिरोने की.... जी हां....और आ गई व्हाट्स एप्प के इतिहास की पहली काव्य पुस्तक भावो की हाला (छंद मुक्त पाठशाला सृजन )

जिसका विमोचन शीघ्र शानदार तरीके से अखिल भारतीय कवि सम्मलेन के साथ होने जा रहा है।

इतिहास के पन्नों मे स्वर्णिम अक्षरो से अंकित हुई इस किताब में विशेष रूप से सुश्री इंदु सिंह जी जिनके बिना यह सफ़र अधूरा था सुश्री आरती सिंह जी कवर चित्र डिजायन आदरणीय गोबिंद चांदना जी आदरणीय अशोक अरोरा जी हयात सिंह जी, सूरज सिंह सार्की जी , भूपेंद्र राघव जी , भीम भारत भूषण जी , संजय मौर्य जी , नजीर जी दीपक शुक्ला जी आदरणीय नीरजा मेहता जी मीनाक्षी जी पदमा जी रूपा गुप्ता जी पूनम संख्यान जी बबिता जैन जी शिवा त्रिपाठी जी शानू गीतम जी रूपा शर्मा जी डेजी जायसवाल जी लष्मी जी सखी जी और तमाम पाठशाला परिवार और पाठशाला के पूर्व साथ नैनी ग्रोवर जी उषा जी राखी शर्मा जी माधुरी रावत जी आदि के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

पाठशाला के एडमिन होने के नाते सभी मित्रो का दिल से आभारी हूँ आगे भी इस तरह की साहित्यिक गतिविधियाँ कवि सम्मलेन काव्य संग्रह छंद मुक्त पाठशाला द्वारा होंगे। आप सभी का आशीष अपेक्षित है।

आदरणीय हेमंत शर्मा जी उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ का भी बहुत आभार उन्होंने इस किताब के संपादन में अपना योगदान दिया।



सभी को शुभ कामनाये... :) :) :) !!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

कविता-२२४ : "शायद, तुम ही हो..."

 जिन्दगी के मरुस्थल में
तन्हाइयो का घर
मुहब्बत की दीवार पर
वफा की उबड़ खाबड़ सी
मिट्टी को
यादो की खिड़की से
झाँकने वाले
शायद तुम ही हो...

उम्मीद के सागर में
भरोसे की लहरो के साथ
उठते संबंधो के
बबंडर में
चाहत के सीपी में
खारा सा अहसास
शायद तुम ही हो...

मन के भावो में
शब्दों की ओट में
कागज के हर कोने में
लेखनी के स्याह से
उकेरे हर दर्द की
आत्मा में
 शायद तुम ही हो...

और जब तुम ही ही हर
और
तो मेरे रहने की गुंजाईश
नहीं शेष...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 5 अगस्त 2015

कविता-२२३ : "प्रेम की डोरी..."

सात फेरो में बंधने
उपरांत भी
एक ही कमरे में रहने वाले
दो लोग...
अलग अलग रहते है
पर दो दूर देशो में
रहने वाले
दो अलग अलग लोग
एक ही होते है

देह का मिलना सब कुछ नहीं
पर प्रीत की डोर
सब कुछ...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

कविता-२२२ : "प्यास कैसी-कैसी ???"


प्यास कैसी ये जगी है
नीर सागर पास
किंतु
हांथ में बर्तन नहीं है...

सोच लू की हांथ अंजुरी
पर नहीं है साथ
यह भी
गदेली जख्मो से भरी है

न हो जब रेखा हमारी
हर ख़ुशी ही
दूर लगती..

साथ पूनम का पाकर
रागिनी ज्यो
दूर भागती...

जंगलो के बीच हूँ पर
पर नहीं
चन्दन नहीं है...

मेहँदी वाले हांथ देखो
है पिया भी
साथ देखो...

लाल रेखा बीच माथे
हांथ में
कंगन नहीं है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 3 अगस्त 2015

कविता-२२१ : "सपने हुये साकार..."


सपने हुए ये साकार
मिल आकर
आओ.... ख़ुशी मनाये.....

फूलो से जैसी सजी
इमारत
पूरी हो गई सबकी
चाहत

कर ले मिलके ही
सत्कार

आओ..... दीप जलाये

ये हवाये क्यों है
खिली खिली
रंग लुटाये अब
तितली...

हो रंगो की....ही
बौछार

आओ... गले लगाये...

मदहोशी सी छाई है
कोई शाम
सुहानी आई है

चेहरे है सब खिले
हुए
दिल भी दिल से ही
मिले हुए

प्रेम पर्व सा....ही
त्यौहार
आओ.. मिलके मनाये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 2 अगस्त 2015

कविता-२२० : "चलते रहो... "

जिन्दगी के ही सफ़र में
है जटिल
पर प्यार किन्तु
शेष है सम्भावनायें

चाहे मुश्किल से
भरी हो
राह में अवरोध कितने

पंछियो को मिलता डेरा
चाहे राह में हो
विरोध कितने

ख्वाहिशो के आकाश में
जब तलक है
शेष
शुभकामनायें...

मत डरो और मत कहो
तुम
सिर्फ लक्ष्य पर
आँखे गढ़ाये

चट्टान कितनी ही बड़ी हो
रफ़्तार नदी की थम
न पाये
व्यर्थ....
सब अलोचनाये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 1 अगस्त 2015

कविता-२२० : "सावन चौखट पर..."

रिमझिम बारिश
खिली बहारें
उमंग भरी रेत की
सिलवट पर
सावन चौखट  पर
साज सजे कितने झूले
खेल खिलोने
रमतूले
मौसम की देखो अंगड़ाई
धरती के ही पट पर
सावन चौखट पर
गुड़िया रानी है मुस्काई
बड़ी बुआ मीठा लाई
लट्टू डोरी
और चपेटा....
मेला लगते
नदिया के तट पर
सावन चौखट पर
पीले धागे की महक है आई
राखी को
ज्यों बहिन सजाई
हल्दी रोरी चावल लगा के
बहिना
रोब जमाये डट कर
सावन चौखट पर
रिश्तों की मिठास बिखरे
बाजार सजे
मनहारी फेरे....
माँ के हांथ की मीठी
खुरमी
हमने खाई गट गट कर
सावन चौखट पर…!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________