बुधवार, 18 फ़रवरी 2015
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015
कविता-५४ : "तिरंगा..."
तिरंगा...,
चंद मीटर टुकड़ा कपडे का
तीन रंग एक चक्र...
कहने को तो महज कपडा ही
पर !
समाया पूरा देश, हिंदुस्तान
सारे मजहब भाषाये और
हर इन्सान
शान से मान से और
पूरे अभिमान से...
सांस लेता है हो सुरक्षित
इस लहलहाते तिरंगे की
आड़ में ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
सोमवार, 16 फ़रवरी 2015
कविता-५३ : "प्रिये तुम..."
भूख में आस जोह कर
प्यास में नेह भर कर
उसे कर लिया अंगीकार
ताकि अखंड हो सके
तुम्हारा सुहाग,तेरा प्यार
नमन तुम्हारी इस इबादत को....
स्मरण हो आता है
जब माँ बनकर मुझे
खिलाती-पिलाती
अपनी दुनिया सजाती हो
नमन तुम्हारी इस चाहत को...
कौंध जाता है
जब घंटों सजती हो
दर्पण को निहार
क्योंकि मुझमें
तुम देखती हो
अपना सौन्दर्य
अपना साज-निखार
नमन तुम्हारी इस सजावट को...
मैं मांगूंगा देव से आज
तुम्हे अनंत काल ले लिए
ताकि मेरी सम्भाल
और मेरे जीवन की
दुआ करने के लिए
तुम हमेशा रहो
मेरे साथ
मनु...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
रविवार, 15 फ़रवरी 2015
कविता-५१ : "अहसास... गूंगे... बहरे...!!!"
तेरे ह्रदय की पीर
गर सुन पाता
तो पीर फिर
कहाँ रह जाती...?
नहीं सुन पाता हूँ
शव्द पीड़ा के
क्योकि...
तुम्हारी मुहब्बत
है गूंगी
और...
मेरे अहसास
शायद..... बहरे...!!!
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अजीब हूँ पर जीव हूँ
निर्जीव नहीं..
वर्ना कहाँ है
शेष
जीवंतता
जिन्दा दिलो में
भी...!!!
_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
कविता-५१ : "भूख और रोटी"
भूख और रोटी का गहरा सम्बन्ध है
सांसो का देह से जैसे अनुबन्ध है...
रोटी भूख को मिटाती है
साँसे शरीर को चलती है...
भूख और रोटी......
दोनों ही जरुरत है इन्सान की
भूख की ज्वाला को रोटी
शांत कर देती है
पर !
रोटी की चाहत रोटी की प्राप्ति
इन्सान पर
इन्सान के कर्म पर....
उसके श्रम पर
मेहनत पर
और कुछ ....
भाग्य पर भी....
इसलिए कहा गया
शायद....
किस्मत हो खोटी
तो भूखे को न मिले रोटी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
शनिवार, 14 फ़रवरी 2015
कविता-५० : "अंतहीन सफर"
कहाँ जायेगी ये डगर...
गर पता होता
तो चला न जाता...
पर रुकने से भी फायदा
क्या ?
चलते चलते..और फिसलते
संभलते...फिर और चलते
बढ़ता जाऊंगा
देखकर सूरज , पाने उसे
फिर शायद
गिरूंगा जमी पर और
हो जाऊंगा खत्म
पर...
डगर तो डगर है
कहाँ होगी खत्म
नहीं पता...
जायेगी कहाँ ??
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_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
कविता-४९ : "समझो मेरे अरमानों को..."
मेरी एक छोटी सी हंसी पर
तुम्हारी मधुर मुस्कराहट
मेरी उदासियो की शीतलहर पर
तुम्हारी रिमझिम रिमझिम चाहत
उधडे उधडे दिल को मेरे
कब डोगे प्यार से सिल के.....
न जाने कब पूरे होंगे अरमान इस दिल के...
मेरी तरसते तड़पते कानो में
तुम्हारी रात रात भर बाते
दिन भर कि बेचेनिया
प्रणय भरी वो राते...
मेरी उदासी
तुम्हारी शरारत जरा सी
रूठना मेरा
मनाना तेरा
श्वेत रंग हो जाता है जैसे
श्वेत में श्वेत ही मिल के
न जाने कब पूरे होंगे अरमान इस दिल के
उलझन मेरी
धड़कन तेरी
आहें मेरी
बाहें तेरी
दर्द मेरा
मरहम तेरा
जिन्दगी के कठिन मोड़ पर
नदी हो चलती है संग साहिल के
न जाने कब पूरे होंगे अरमान इस दिल के...!!!-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल
जैन’_________
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015
कविता-४८ : "तुम्हारे लिये... मेरा सृजन..."
वो लिखती है तो
कमेंट्स एवं लाइक की
बरसात हो जाती है
और जब लिखता हूँ में
तो कमेंट्स एवं लाइक
का
पतझड़ अषाढ रहता है
फर्क लिखने और कलम
की
गहराई का नहीं है
केवल
शव्द उनके भी है
शव्द हमारे भी
अंतर सिर्फ इतना सा
वो लिख...ती है
और हम लिख...ते
है...!!!
लिख रहा हूँ में
आज ये कविता..
अंतिम...
निश्चित ही ..
आखिरी शव्दावली है
ये..
इस साल की...
सच, इस साल और कोई
सृजन नहीं करेगी
मेरे लेखनी...
लिखने के तुरंत बाद
ही..
तुम्हारे पढने का
सदेव ही
इंतजार रहा है
मुझे...
लिखने के कुछ दिवस
बाद भी
तुम्हारा पढना मंजूर
नहीं था हमे
कभी...
पर..
इस अंतिम कविता में
बहुत समय दिया है
तुम्हे..
पुरे एक साल बाद..
अगले साल तक भी...
पढ़ लेना .
पर पढना जरुर...
और हमेशा की तरह
कमेंट जरुर करना..
बहुत समय है
तुम्हारे पास...
क्योकि...
साल भर बाद भी
तुम्हारे कमेंट से
..
ये रचना शायद..
अमर हो जाये..
सालो सालो के
लिए...!!!
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______ आपका अपना : 'अखिल जैन' ______
बुधवार, 11 फ़रवरी 2015
कविता-४७ : "ऐसे ही होते रहेंगे मतदान..."
आज सुबह
से शाम
तक...
अलग अलग
जगहों
पर...
पर्दों के पीछे
इलेक्ट्रानिक
मशीन पर...
अठारह साल
से ऊपर
का हर
आदमी...
दवायेगा
किसी की
किश्मत
का निशान...
आयेगी एक
आवाज
टें टें..
और ये
टें टें
की आवाजे...
एकत्रित हो
जायेगी
प्रत्याशियों के
किस्मत के
खाते में...
हाँथ की
एक उंगली
में नीली स्याही
का गाढ़ा
निशान...
लेकर
लौट जायेगे
हम...
पर
इन एकत्रित
हुई
आवाजो...
की
बहुमत्ता
ही...
शोरगुल में
तब्दील
हो जायेगी
किसी एक
प्रत्याशी की...
और वो
बैठ जायेगा
कुर्सी पर
अगले पांच
वर्षो के लिये..
फिर...
वैठा ही रहेगा
खड़ा नहीं होगा
तुम्हारे
लिये...!!!
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015
कविता-४६ : "मैं या आप"
ग़ज़ल का ग भी पता
नहीं....
लेखन और साहित्य
क्या
इसका कुछ अता पता
नहीं
सिर्फ पता है
कि...
लिखता हूँ दिल से
कलम से
कागज पर
शव्दों को...
और !
आप खुद कहते है
मुझसे
कविता
ग़ज़ल
लेखन
साहित्य..!!!
आदमी....
आदमी के अन्दर एक
आदमी
इस आदमी के अन्दर
एक और आदमी
एक आदमी सच का
दूसरा आदमी झूट
का
और!
तीसरा ही बतलाता
है
कि...
कब कौन सा बोलेगा
आदमी...!!!
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_____ आपका अपना : 'अखिल जैन' _____
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