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सोमवार, 16 मार्च 2015

कविता-८३ : "गुड्डे-गुड़िया की शादी...!!!"

मिट्टी के गुड्डे गुडिया
रंगीले कपड़ो से उनका श्रंगार
हल्दी रोली से उनका टीका
आटे की छोटी छोटी अठबाई
कुछ मिष्ठान पकोड़े...

फिर उनका संस्कार विवाह..
फेरे बरगद के पेड़ के...
सच... सोचकर ही पहुँच जाता हूँ
उसी मदमस्त बचपन में...


जहाँ नहीं चाहते बड़े होना
कभी...
ये आनंद की अनुभूति ही
लौटा देती है मेरा
सब कुछ...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

रविवार, 15 मार्च 2015

कविता-८२ : "आंसू की बूंद... "

आँसू की बूँद...

कहाँ ढूँढ रहे हो वहां
जहाँ बूँद तो क्या कतरा भी
नहीं मिलेगा...
सबके पास नहीं होती ये बूंदे
होकर भी...

दर्द अहसास संवेदना ही बनाती है
इन्हें मिलकर
इसलिये होती है ये खारी
शायद...

चलो उस बस्ती में बुढिया के घर
देखो उसकी बेटी और बेटो को
फिर देखना बुढिया की चेहरे की
लकीरों को...

उसके जवान बेटी के अधफटे कपड़ो को....
उसके बच्चे के भूखे पेट को....
आँसू की बूंदे तो क्या
बाढ़ देखने मिलेगी इस खारे
पानी की....

तब टूटेगा भ्रम तुम्हारा कि
ये बूंदे सिर्फ आँख में रहती है
इसके बाद भी लगे तो आ जाना
इन बूंदों की सुनामी दिखाऊंगा
यही कहीं...

खोल लेना मेरी कलम का
ढक्कन पीछे से
और गिरा देना उल्टा करके
बूंदे ही मिलेगी इन आसुंओ
की तुम्हे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

शनिवार, 14 मार्च 2015

कविता-८१ : "फेस बुकिया प्यार...."

मेरे ह्रदय के खाली
स्टेटस पर...

तुम अपने अहसासों की
डाल दो पोस्ट...

मै करूँगा भरोसे का लाइक
स्नेह का कमेंट..

जहाँ करेंगे दोनों मिल कर
हम दोनों अपने
रिश्ते को शेयर...

पर रखना याद
कि...

हम और हमारे प्यार से
नफरत करने वाले को
करना जरुर...
टैग...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

कविता-८० : "वेलेंटाइन डे..."


भारतीय संस्कृति के लोग जब...
दीवाली दशहरा ईद छोड़ कर
वेलेंटाइन डे मनाते है...

अपनी धरती पर विदेशी परचम लहराते है
तब हम जैसे लोग समझ नहीं पाते है..
कि क्यों ??

पश्चिमी देशो की उतारन अपना रहे है..
अपने पवित्र त्योहारों को छोड़ अश्लीलता फहरा रहे है..
क्या सोचा है कभी...

जिन देशो से हमने वेलेंटाइन डे आदि त्योहारो
का हरण किया है...
क्या उस देश के बासियो ने त्यौहारों के प्रतीक
प्रेम का अनुशरण किया है...

माना उन देशो में ऊँची ऊँची बिल्डिंग पैसा
आधुनिकता मोटर और कार है.....
परन्तु, प्रेमी प्रेमिका तो ठीक..
माँ और बेटे के बीच भी नहीं प्यार है...

प्रेम तो ठीक..
न दुलार है न अपनत्व है न संस्कार है..
सिर्फ और सिर्फ मारम्मार है...
प्रतिस्पर्धा है..
न रीति रिवाज है न मर्यादा है...

धर्म, रिश्तो मान सम्मान में हमसे आधा है...
और वैसे भी प्रेम को किसी
त्यौहार की जरुरत नहीं पडती...
इसका अहसास ही एक त्यौहार होता है...
वह किसी एक दिन पर स्थिर नहीं होता...

प्रेम का प्रतिपल मजेदार होता है...
जब नहीं था वेलेंटाइन डे..तब क्या प्रेम नहीं था..
प्यार नहीं था.....
था मगर...
अश्लीलता का व्यापार नहीं था..

अरे...
यदि प्रेम देखना है तो भारत में आकर देखो...
देखते देखते आँखे प्रेमी हो जाएगी...
जब तक बेटा घर लौटकर नहीं आता..
तब तक माँ भूखी रहती है...
तब प्यार की परिभाषा खुद ही दिखती है...

बाप के कंधे पर देखोगे उसके लाडले का भार
उसी पल पा जाओगे श्रेष्ठ प्यार..
एक मंगलसूत्र बिंदी..
एक सुहागन नारी का धर्म बताती है...
तब प्यार की बड़ी सी परिभाषा
एक छोटी से बिंदी में नजर आती है...

तुम्हारा एक गुलाब का फूल
अपना प्यार जताता है....
यहाँ एक भाई द्वारा बंधवाया रक्षा सूत्र
जिन्दगी भर बहिन की सुरक्षा का
जिम्मा उठाता है...

माँ भारती के कण को जब कोई दूसरा देश छू लेता है..
उस वक्त यह देश हजारो कुर्वानियां दे देता है...
अब तुम किसे प्रेम समझते हो...
क्यों प्रेम का झूठा प्रदर्शन करते हो...

अतः मित्र..
मनाना है तो वो त्यौहार मनाओ...
जो हमे संस्कृतिक विरासत में मिले है...
वेलेंटाइन डे जैसे दिवस नहीं प्रेम का दर्शन है...
ये तो प्रेम के आड़ में अश्लीलता का प्रदर्शन है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

गुरुवार, 12 मार्च 2015

कविता-७९ : "ख़ुशबू मिट्टी की..."

ख़ुशबू मिट्टी की उपजी धरती से
गंध पहुंची सीधे अंतस तक
आनंद बिभोर होता हुआ मन
मयूर की तरह...

जैसे सावन में झूमता है मयूर
ठीक वैसे भी मन मयूर
झूमता मिट्टी की खुशबू में...
सूँघने के साथ आज मैंने
सुनी भी...

मिट्टी की मधुर आवाज..
जो थी बिलकुल मिट्टी की
ही तरह...
सोंधी सोंधी...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

बुधवार, 11 मार्च 2015

कविता-७८ : "हम और तुम..."

आकाश की ऊँची जमीं नहीं
धरा की सच्चाई पर रहते हैं हम और तुम
 मै रहता हूँ...
समुन्दर के खारे पानी में
और तुम ..
समुन्दर किनारे

शंख ए सीप और नम रेत के कणों में
एक लहर के आते ही
एक ही हो जाते हैं हम और तुम...

मै रहता हूँ
दूर दराज गाँवों में बसे
उस खेत की काली मिट्टी में
और तुम...
उस मिट्टी की भीनी खुशबु में...

मै रहता हूँ
बगिया के मदमस्त प्रसूनो में
और तुम...
फूलो के मध्य पराग दानो में
मेरे संग महकाती हो
जीवन बगिया हमारी...

मै बदले मौसम की अँगड़ाई में
तुम प्रकृति संग कोयल गीतों में चहकती हो
 मै रहता हूँ
कलकल बहता नदियों के पानी में
और तुम...
नीड अमूर्त चट्टानों में...

मै रहता हूँ फुलबारी में
तुम मयूर के पंखो में....

मै नर्मदा के पैरो में बहता
बहती तुम यमुना के माथे पर..

मै रहता हूँ
कस्बे के उस पुराने शिव मंदिर की
दीवारों में
और तुम....
उसके बाहर लटके ध्वनि शंख में
जिसके बजते ही
तुम्हारा मधुर संवेग से भरा स्वर
मुझे प्रणय से भर देता है
तुम्हारे संग
और एक ही हो जाते

हम और तुम...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

मंगलवार, 10 मार्च 2015

कविता-७७ : "सचिन तेंदुलकर की विदाई..."

कद...
आदमी का छोटा क्यों न हो ?
उसके विचार, सोच और गुण
उसे बड़ा बना ही देते हैं
इतना बड़ा !
कि...

सर्वस्व झुक जाता है उसके आंगे
बड़ी बड़ी हस्तियाँ बड़े बड़े लोग
भी बौने हो नजर आते हैं
उस छोटे कद के आंगे...

24 वर्षो की लगातार मेहनत
व लगन ने ही..
पहुँचाया है तुम्हे आज
क्षितिज के उस आसमान में
जहाँ खेल के महानायक की आँख के
कुछ अश्रु...

विश्व के लोगो की अश्रुधारा में
तब्दील हो गये..
जब तुम्हारे कदम जा रहे थे
मैदान छोड़कर...

तब तुम्हारे कदमो की आहटो से
तालियों की गडगडाहट कह रही थी
मत जाओ...लौट आओ..
पर !
खेल चलता आया है
चलता रहेगा निरंतर...

तुम्हारा विकल्प
स्थान और दर्जा..
नहीं पता कुछ ??
पर ये महाविदाई के पल
स्मृतियों के मधुर कोष में
संछिप्त रहेंगे सदा...

तुम भले ही मैदान से चले गये हो
पर लोगो के दिलो के मैदान में
हमेशा ही रहोगे...
 नॉट आउट...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

सोमवार, 9 मार्च 2015

कविता-७६ : "महिला दिवस...०२"

महिला दिवस आज
और...
सिर्फ आज...
महिला सशक्तिकरण , 
सम्मान...और महिला गाथा..
की बातें...

शुभ कामनाये..बधाइयाँ..
टेलीविज़न, रेडिओ, अख़बार..
इन्टरनेट, पर महिला ही महिला..

गोष्ठी, परिचर्चा...सेमिनार...
महिलाओ के सम्मान, उत्थान..
पर....
पर सिर्फ आज...

बाकि दिन महिला...
कभी....
आरुषी... निर्भया... दामिनी...
कहीं शोषण...
कभी उत्पीडन..
कहीं अत्याचार...
कभी हिंसा..बलात्कार...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

रविवार, 8 मार्च 2015

कविता : ७५ : "महिला दिवस...०१"

आओ... आओ... आओ...
मनाये ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’...

डाले सभी पोस्ट
बेनर के साथ
लिखे नारी सम्मान पर लेख
और कविताये...

इनबॉक्स में सभी महिला मित्रो
को दे शुभकामनाये
घर की महिला को छोड़कर...

नारी की महिमा का कर बखान
सुबह से शाम
मन गया महिला दिवस
और हो गई रात...

जहाँ एक और महिला इंतजार
में होगी
तुम्हारी गालियो की
चांटे की
और उन्ही चीजो की
जिसको करके पुरुष जताता
आया है पुरषत्त्व सदा ही...

मर्द के दर्द में पिसती हुई सी नारी
घर के अंदर भी
और....
घर के बाहर भी..

पुरुष की थकान के बाद
दारु की गंध
और पसीने की बूँद से भीगी
नारी...

कह रही है मुझसे तुमसे
और सबसे...

आओ....आओ ..आओ
और सब मिलकर मनाओ
‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

कविता-७४ : "आखिर कब तक...???"


न जाने क्यों ??
कभी खुश नहीं होता है आदमी
जिन्दगी के पड़ाव पर...

समय की नाव पर
उलझा रहता है
काम में धाम में...
मित्र में शत्रु में
अपने में पराये में
लाभ में हानि में...

अनभिज्ञ होता है शायद ?
डरता है सत्य से...
प्रकृति के कृत्य से...
जानकार भी नहीं सोचता
जीवन का सार...
समय की मार...

मौत से बेखबर चलता रहता है..
वह निडर.....
कब तक...
आखिर कब तक...?
??
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कविता-७३ : "दिल में होली जल रही हैं...!!!"

स्वप्न से लगते हो तुम अब
प्रार्थनाए क्यों मौन है
उम्मीद की ,उम्मीद कहाँ है
साथ अब भी कौन है
सांस क्यों मचल रही है
दिल में होली जल रही है...
मत पढ़ो अब गीत मेरे
जिंदगी के सुर जान लो
न रहा हूँ तुम्हारा
किन्तु ये भी मान लो
थमता नहीं ये प्रेम सागर
उम्मीद अब भी पल रही है
दिल में होली जल रही है...

चाँद सा है रूप तेरा
मुस्कान फूलो सी तुम्हारी
तुम जो गर साथ दे दे
महक जाये बगिया हमारी
रात की एक आस में
साँझ भी तो ढल रही है
दिल में होली जल रही है...!!!”
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 5 मार्च 2015

कविता-७२ : "आसूँ की बूँदें..."


 आसूँ की बूँदें..
तुम्हारी आखों की
गिरती जमीं पर
पहले इसके लगा लिए मैंने  अपने हाँथ...

जिस तरह छोटा बच्चा गदेली में
कोशिश करता है समेटने की
तैरती मछली को...

हाँथ की गदेली में बना कर एक
गड्डा छोटा सा
रखने की हो कोशिश, कीमती मोती की
आंसू भी कीमती मोती ही थे
खारे पानी के स्वाद में...

कई मिठास छिपी थी मेरे लिए
छिपाया , समेटा गदेली की छोटी गहराई में
छोटी किन्तु विशाल भावनाओ की...
प्रदर्शिता को...

सोचा!
अबिलम्ब...
ले जाऊ पवित्र गंगा में करने
समाहित....
या पावन तुलसी में करूँ विसर्जित..
ईश्वर के आले में रखे
उनके अभिषेक के प्रासुक पानी में...

पर!
सोचते सोचते...
बूँदें आंसुओ की..
सूख गई....हवा की तरह..
हवा ही हो गई...

और!
मेरी गदेली की सूखी त्वचा
पर...
अहसासों की कविता लिख गई
मेरी माँ की
अश्रुधारा से...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________