मंगलवार, 14 अप्रैल 2015
सोमवार, 13 अप्रैल 2015
कविता-१११ : "सपेरे...."
निकाल लेता हूँ तू जहरीले दांत
नाग के...
पश्चात ही ले जाता है दरवाजे दरवाजे
नाग को इंसानों के पास...
ताकि रहे इन्सान सुरक्षित
नाग के जहरीले दंश से...
काश निकल जाते ये जहरीले दांत
आदमी के भी, कुछ ही दिनों के लिये
तो दूसरा आदमी भी होता सुरक्षित...
और न डंसा जाता ..
आदमी से ही....
कुछ दिनों के लिये ही सही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
रविवार, 12 अप्रैल 2015
कविता-११० : "कौन अमीर...?"
बालक...
नंगी देह नंगे पैर
चिलचिलाती धूप
और तपती सड़क....
पीठ पर बड़ी सी फटी
चिथी बोरी में..
कचरे में से बीनते हुए
लोहा प्लास्टिक और
कुछ खाली बोतले काँच की
आखिर !
यही तो जिन्दगी है तेरी
और जिन्दगी के मायने भी...
माँ की दवाई
बाप की दारु
बहिन के कपडे
और तेरे खाली पेट का
भूख मिटाने का सामान भी...
पर क्यों ?
जब एक बच्चा चार पहिया में
आधुनिक सुख सुविधाओ में
पलता पोसता बड़ा होता है
इस समाज में ही..
तो क्यों नहीं तुझे ये अधिकार
क्योकि तू गरीब है
निर्धन है, पर क्या ??
वाकई तू बना है इसी के लिए
तेरी नंगी देह और
चिलचिलाती धूप का रिश्ता
तेरी गरीबी से है तो
फिर ये समाज भी नहीं
अमीर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 11 अप्रैल 2015
कविता-१०९ : "शब्द मुझे दे दो..."
जिसमे लिख दूं मै समेटकर
उसकी पीड़ा, इसका दर्द
और तुम्हारी जरुरत...
मेरा छोड़ दो, मेरा कुछ नहीं...
क्या लिखूंगा अपना
भला शून्य जो हूँ मै...
तुम तो बस वो शब्द मुझे दे दो
अब दे ही दो ना...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015
कविता-१०८ : ".क्या है प्रेम...?"
प्यार तो करती ही हो
भले न कहो ये
बात है अलग...
अब भला कहने की भी जरुरत क्या
क्योकि शब्द..आवाज.. और दिखावे
से तो दूर ही है प्रेम....
अहसासों की निः शब्द पर्णकुटि में
अथाह गहराई में बसता है...
प्यार ...जो मौन ही रहता है
बिल्कुल तुम जैसा ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
गुरुवार, 9 अप्रैल 2015
कविता-१०७ : "तुझे प्यार कर रहा हूँ मै... "
मैंने तुझे जग से माँगा
नहीं मिला...
फिर
सब से माँगा
नहीं मिला....
वहां से माँगा
नहीं मिला...
फिर रब से माँगा
अभी तक नहीं मिला...
पर !
अभी भी मिलने की आस कर
रहा हूँ मै...
किसी टूटते तारे की तलाश
कर रहा हूँ मै...
हाँ...
तुझे प्यार कर रहा हूँ मै...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
बुधवार, 8 अप्रैल 2015
कविता-१०६ : "जीवन एक सपना............"
जीवन एक सपना....
इस सपने में कोई नहीं अपना
कोई हकीकत नहीं....
मंजिलो का सुख नहीं....
आँख खुलने के बाद सिर्फ
शून्य ही है सब....
और इसी जीवन को जीवन
को जीते जीते.....
फिर से लग गई ये आँख...
फिर से ये स्वप्न
सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक
वही झूठे रिश्ते नाते...
लेकिन एक हकीकत भी
है शायद...
वो हो तुम...
और जब जहाँ तुम हो
वहां सपना , सपना नहीं
जिन्दगी हो जाती है...
हां सच मे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
मंगलवार, 7 अप्रैल 2015
कविता-१०५ : "अहसास तेरे प्यार का..."
अहसास तेरे प्यार का
सिर्फ अहसास तक ही कहाँ...
तेरा प्यार
घुल कर मेरी साँसों संग
देता है जिन्दगी मुझे...
जहाँ मै हो चलता हूँ तेरा
और तू मेरी
फिर मेरा प्यार का अहसास...
और..
तेरे प्यार का अहसास
हो जाते एक ही...
फिर प्यार, प्यार कहाँ रह जाता
परमेश्वर हो जाता है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
सोमवार, 6 अप्रैल 2015
कविता-१०४ : "जिंदगी का दर्द..."
जिंदगी दर्द है
या
दर्द जिंदगी...
ये तो नहीं पता मुझे
और न चाहता हूँ
पता करना, क्योकि...
जिन्दगी में दर्द हो या
दर्द में जिन्दगी जो
दर्द तो है ही...
और जब दर्द है तो
फिर जिन्दगी...
जिन्दगी कहाँ बचती
लेखनी बन जाती है
मेरी...
जो लिखती है
ज़िन्दगी का दर्द
और दर्द में जिन्दगी ही
शायद...!!!
ज़िन्दगी का दर्द
और दर्द में जिन्दगी ही
शायद...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
रविवार, 5 अप्रैल 2015
कविता-१०३ : "हमने और तुमने..."
तुम्हारी जो लम्बी सी गर्दन है ना
सुराही जैसी...
उस पर ठहरी थी बारिश की एक बूँद
जो तुम्हारे लहलहाते हुए गेसुओ से
उतर कर आ गिरी थी..
और नीचे आती और गिरती जमी पर
पहले इससे ही...
अधरों से मिला लिया जिव्हा रस में
मैंने...
नहीं गिर पाई वो स्पर्शित बूँद
तुन्हारे बदन से जमी पर..
क्योकि जमी से उठकर ही तो
प्यार किया है
हमने और तुमने..
है ना...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 4 अप्रैल 2015
कविता-१०२ : "बलात्कार..."
हर दिन ..हर
पल...हर छण..
कहीं न कहीं...
इधर....उधर...और जाने किधर
प्रतिस्पर्धा सी हो गई अब तो
कौन कितना दर्द देगा...
कहीं न कहीं...
इधर....उधर...और जाने किधर
प्रतिस्पर्धा सी हो गई अब तो
कौन कितना दर्द देगा...
और निर्णय आएगा...
अख़बार इन्टरनेट पर
पत्र पत्रिकाये में
और फिर कुछ लोग तो है ही
पीडिता का फिर से करने
बलात्कार...
पत्र पत्रिकाये में
और फिर कुछ लोग तो है ही
पीडिता का फिर से करने
बलात्कार...
उतार देंगे शब्दों में उसकी कहानी
लगा देंगे नीचे उसकी शोषित नग्न देह
की तस्वीर...
मिलेंगे ढेरो लाइक और कमेंट
फिर दब जाएगी ये पोस्ट
कुछ दिनों बाद
हो जायेगा विषय पुराना...
पर ये दर्द पीड़ा और वेदना
और बढती जाएगी...
समय के साथ साथ
बलात्कार के बाद भी
बलात्कार...
एक और बलात्कार
फिर एक और बलात्कार
फिर हर और हर छोर
बलात्कार...
फिर एक और बलात्कार
फिर हर और हर छोर
बलात्कार...
नारी का नारी के मन का
और उसकी आत्मा का...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015
कविता-१०१ : "हाँ... तुम ही..."
हो गये बहुत दिन अब...
अच्छे दिन भी तो
आ गये भला
लिखना ही होगा बेहतर...
लिखना ही होगा बेहतर...
खुद के लिये और तुम्हारे लिये भी
क्योकि तुम दिल से होते हुए
आते हो दिमाग पर...
और दिमाग से विचारो के संग
घुलकर अहसासों में आ बैठते हो
कलम पर....
और बहने लगते हो नीली स्याही संग
श्वेत कागज पर...
और उकेरे हुए आखरो में तुम्हारा चेहरा/
सम्पूर्ण तुम ही..
जैसे सागर की लहरों पर
वक्त की उँगलियों के निशान...
सृजित हुए आखरो में जो
दिखता है.. वह ही होता होगा
कविता या कोई शब्द श्रंगार...
पर मेरे लिये सिर्फ और सिर्फ
तुम... सिर्फ तुम...
हां तुम ही...
और तुम में मै खुद
और खुदा मेरा...
जिससे सफल हो जाता है
लिखना मेरा...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
गुरुवार, 2 अप्रैल 2015
कविता-१०० : "क्या हैं न्याय???"
क्या है न्याय...???
इन्सान के मौलिक
अधिकारों
का संरक्षण / प्राप्ति...
का संरक्षण / प्राप्ति...
या सिर्फ इन्सान द्वारा
निर्धारित एक तंत्र...
जिसमे नियमो के दायरे
में न्याय की गुहार लगाता
उसे पाने वह
घूमता है दर बदर
और न्याय सिर्फ बैठा होता है
एक तराजू में...
और हँसता रहता है
इन्सान पर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
बुधवार, 1 अप्रैल 2015
कविता : ९९ : "ओंस की बूंदें..."
पत्तों पर गिरती हैं ना
तब बन जाती हैं मोती...
और पत्ते का
हो जाता है सम्पूर्ण
श्रृंगार...
और... कुछ बूँदें
सिर्फ बूँदें ही रह जाती हैं...
और... पत्ते सिर्फ जर्द पत्ते
लेकिन बूँद ओस की
मोती जैसी ही लगती है
निर्मल...
शीतल और पारदर्शी
मेरे तुम्हारे प्रेम की तरह...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
मंगलवार, 31 मार्च 2015
कविता-९८ : "काश मिलता होता..."
काश मिलता होता
किसी दुकान पर....
तो होता कितना अच्छा ....
रोज रोज की
ये भीख सी आदत मांगने की..
और... रोज रोज का
भाव खाना/ मना करना
खत्म कर देता..
खाली हाँथ जाता दुकान पर
और
लाता झोली में स्नेह प्यार ढेर सारा...
कितना अच्छा होता
है न...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
सोमवार, 30 मार्च 2015
रविवार, 29 मार्च 2015
कविता-९६ : "एक इन्सान की तरह..."
दीवारे गन्दी हो जाती है
रंग रोशन फिर से साफ़ कर
देती है गंदगी दीवारों की
काश...
कोई रंग ऐसा भी होता
कि... इन्सान के ह्रदय में
लगा भंगुर, गंदगी
साफ़ हो जाती
और... इन्सान हो जाता
फिर से एक इन्सान की तरह....!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 28 मार्च 2015
कविता-९५ : "तुम्हें आना ही होगा... राम..."
मर्यादा पुरषोत्तम
राम
!
तुम्हारी मर्यादा , नीति , न्याय
वचन और असीमित त्याग
जो कण कण में बिखराया था
तुमने
शेष कहाँ अब ?
तुम्हारी ही मूर्ति चोरी हो गई
तुम्हारे ही आलय से
कल ही पढ़ा था अख़बार में
सीता समान पत्नि की कर दी हत्या
दहेज़ के कारण
भरत तुल्य भाई को कुल्हाड़ी मारी
जमीन के बटवारे में
अब तो तुम्हारे नाम पर
राजनीति भी...
आ ही जाओ राम फिर से
देखो रावण आज
हर घर में ही बैठा है
अपनी हुंकार के साथ
तुम्हे अब आना ही होगा
हे राम...!!!
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
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शुक्रवार, 27 मार्च 2015
गुरुवार, 26 मार्च 2015
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