सोमवार, 22 जून 2015
रविवार, 21 जून 2015
कविता-१७८ : "मिटटी की आवाज़..."
ख़ुशबू मिट्टी की उपजी धरती से
गंध पहुंची सीधे अंतस तक
आनंद बिभोर होता हुआ मन
मयूर की तरह...
जैसे सावन में झूमता है मयूर
ठीक वैसे भी मन मयूर
झूमता मिट्टी की खुशबू में...
सूँघने के साथ आज मैंने
सुनी भी...
मिट्टी की मधुर आवाज..
जो थी बिलकुल मिट्टी की
ही तरह...
सोंधी सोंधी...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 20 जून 2015
शुक्रवार, 19 जून 2015
सुर-१७६ : "शर्त और जिंदगी..."
शर्तो पर रखी जिन्दगी
शर्तो जैसी ही होती है..
दम तोडती सी...
साँसे छोडती सी...
काश !
जिन्दगी ने रखी होती
शर्त...
शर्त न लगाने की तो
शायद...
जिन्दगी होती फिर
जिन्दगी के अहसास सी..
कुछ खास सी....
अखिल
एक ख्याल यूँ ही ....
बस अभी अभी...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
गुरुवार, 18 जून 2015
कविता-१७५ : "दे दो ना..."
तुम वो शब्द मुझे दे दो....
जिसमे लिख दूं मै समेटकर
उसकी पीड़ा इसका दर्द
और तुम्हारी जरुरत....
मेरा छोड़ दो, मेरा कुछ नहीं...
क्या लिखूंगा अपना
भला शून्य जो हूँ मै......
तुम तो बस वो शब्द मुझे दे दो
अब दे ही दो ना...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
बुधवार, 17 जून 2015
कविता-१७४ : "तुमसे मैं... मुझसे तुम..."
मेरी परेशानी पर हंसा देते थे तुम
पर तुम्हारी परेशानी पर
तुम क्यों नहीं हँसते क्यों नहीं हंसाते
जबकि जानते हो कि
तुम जो रहोगे परेशांन तो मै भी
कहाँ ठहरती है मुस्कान
मेरे चेहरे पर...
ये परस्पर संबंधो की प्रगाढ़ता ही है
और हमारी अंतरंगता जन्मो की
कि तुमसे तो ही मै हूँ
और मुझसे ही तुम...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
मंगलवार, 16 जून 2015
कविता-१७३ : "इंसानियत..."
मै ईश्वर पर यकीं नहीं करता ज्यादा
न ही उसके चमत्कारों अवतारों पर
प्रार्थनाये धार्मिक क्रिया कांड
सब शून्य ही है मेरे अन्दर
नहीं झुकता आसानी से शीश मेरा
देव आलयो और पत्थरो के आंगे
पर एक चीज एक बात जो
हरदम झुका देती है
सर्वस्व मेरा लुटा देती है
वह है इन्सानियत...
और ये इंसानियत / मानव सेवा
ही दिलाती है मेरा धर्म
मेरी प्रार्थना और मेरा
ईश्वर...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
सोमवार, 15 जून 2015
कविता-१७४ : "तेरा साथ... 13-7 "
ये तारीखे भी आती है
चली जाती है.....
पर कुछ तारीख जेहन में
उतर जाती है..
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे
नर्म हांथो पर रंग मेहँदी का...
अब आज की तारीख ही देख लो
13-7 तेरा सात...
कैलेंडर में दिखता है चेहरा तेरा ही..
और साथ तो है ही वर्ना
क्यों दिखता तेरा चेहरा
कागज के कैलेंडर में / तारीख में
लेकिन बदलेगी ये तारीख कल
एक समय के बाद...
पर नहीं बदलेगा हमारा प्यार
आज की तारीख की तरह...
जीवन भर ही रहेगा
तेरा साथ 13-7...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
रविवार, 14 जून 2015
कविता-१७३ : "जमीं से उठकर किया प्यार...!!!"
तुम्हारी जो लम्बी सी गर्दन है ना
सुराही जैसी...
उस पर ठहरी थी बारिश की एक बूँद
जो तुम्हारे लहलहाते हुए गेसुओ से
उतर कर आ गिरी थी..
और नीचे आती और गिरती जमी पर
पहले इससे ही..
अधरों से मिला लिया जिव्हा रस में
मैंने...
नहीं गिर पाई वो स्पर्शित बूँद
तुन्हारे बदन से जमी पर...
क्योकि जमी से उठकर ही तो
प्यार किया है
हमने और तुमने..
है ना...!!!
-------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 13 जून 2015
कविता-१७२ : "आंसू की बूंद..."
आँसू की बूँद...
कहाँ ढूँढ रहे हो वहां
जहाँ बूँद तो क्या कतरा भी
नहीं मिलेगा...
सबके पास नहीं होती ये बूंदे
होकर भी...
दर्द अहसास संवेदना ही बनाती है
इन्हें मिलकर
इसलिये होती है ये खारी
शायद...
चलो उस बस्ती में बुढिया के घर
देखो उसकी बेटी और बेटो को
फिर देखना बुढिया की चेहरे की
लकीरों को...
उसके जवान बेटी के अधफटे कपड़ो को....
उसके बच्चे के भूखे पेट को....
आँसू की बूंदे तो क्या
बाढ़ देखने को मिलेगी इस खारे
पानी की...
तब टूटेगा भ्रम तुम्हारा कि
ये बूंदे सिर्फ आँख में रहती है
इसके बाद भी लगे तो आ जाना
इन बूंदों की सुनामी दिखाऊंगा
यही कहीं...
खोल लेना मेरी कलम का
ढक्कन पीछे से
लेकिन संभल कर....
इससे निकलने वाली
आसुंओं की बूंदों में
सच्चा इंसान डूब भी सकता है...!!!
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शुक्रवार, 12 जून 2015
कविता-१७१ : "मुझमें सिवा मेरे..."
तनहाइयो भरी शाम में
दर्द और थकान में...
उलझ गया हूँ गुत्थियों में
सुलझने की चाह में...
वक्त का कसूर ये
लकीरों का दस्तूर ये
नाकामी ही जीत अब
हार के मैदान में...
तू जो गर न पास है
फिर क्या है शेष अब
सिवा मेरे सिवा तेरे
मुझमे... सिवा मेरे...!!!
-----------------------------------------------------------
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
गुरुवार, 11 जून 2015
बुधवार, 10 जून 2015
कविता-१६९ : "मेरे तुम्हारे बीच..."
मेरे तुम्हारे बीच...
सम्भावनाये कहाँ है शेष
औरो की तरह...
प्यार तकरार सच झूठ
और दुनिया की झूटी रस्मो
रिवाजो से
बहुत ऊपर हो चुके तुम और
मै...
मॉस की पिंडलो से बने
शरीर
अलग अलग जरुर हैं
पर आत्माये तो एक ही..
जब दो होकर भी हो गये
एक ही तो
क्या बचा ?
मेरे तुम्हारे बीच
सिर्फ हम और हमारी
जिन्दगी
है न...!!!
-----------------------------------------------------------
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
मंगलवार, 9 जून 2015
कविता-१६८ : "कैसे कह दूँ...???"
बताना होगा तुमको ही आज
कर लो कुछ भी
पर...
पर...
ये रोज के रोज की घंटो बाते
रूठना झगड़ना
और भी कुछ अनकहा सा...
चिंता रहती है तुम्हे
मेरी खुद से भी ज्यादा...
और पूछो तो वही रटा पिटा
सा जवाब
कि नहीं है प्यार तुमसे...
मत कहो
बिलकुल न कहो
पर,
ये बता दो कि
कैसे कह दू
मैं कि मुझे तुमसे है
प्यार बहुत
सच...!!!
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
सोमवार, 8 जून 2015
रविवार, 7 जून 2015
कविता - १६६ : "तुम कौन हो ???"
कौन हो तुम???
और क्यों आई अचानक से
कहाँ थी अब तक ?
रात को सोया था तब
तुम नहीं थी पास
हर रात की तरह अकेला था
कलम के साथ ही...
पर, आज नींद खुलते ही
साथ हो तुम
मौसम भी सुहाना सा है
फूल कुछ ज्यादा ही रंगीन है
कुछ तो बदला है
शायद...
नजरिया बदला हो मेरा
या आँखे ही
ये आवाज कैसी
तुम्हे प्यार करती हूँ मैं...!!!
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
शनिवार, 6 जून 2015
कविता-१६५ : "नजर उसकी जी कातिल है..."
नजर को मेरी
तुम्हारी नजरो के साथ ही
दूर किनारे उस पनघट के
उड़ा ले गई थी जहाँ
लगा है एक उम्मीद का बड़ा
सा वृक्ष...
लोग प्रेम भी कहते है इसे
इस छायादार पेड़ के
नीचे ही लिख रहा हूँ आराम से
तुम पर ,तुम्हारी नजरो के सामने
क्योकि...
नजरे तुम्हारी कातिल जो है
है न...!!!
-----------------------------------------------------------
-----------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

















