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बुधवार, 22 जुलाई 2015

कविता-२१० : "मिट्टी... तेरी... मेरी..."

मेरी देह की मिट्टी
तेरे देह की मिट्टी सी है
फर्क
सिर्फ इतना है कि
तुमने उगाये
दुराचार अनैतिकता और
तमाम बुराइयो के शूल
मेरी मिट्टी की तासीर
अलग है तुमसे
जिसने उगाये हमेशा
सदाचार आचरण और नैतिकता
के फूल

अब बताओ ??

किसकी मिट्टी अच्छी
और किसकी फिजूल...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

कविता-२०९ : "यादें..."

तुम्हारे कहने पर
भूल जाऊंगा तुम्हे और
तुम्हारी हर बात को…

गुजरे हुए बीते हुए उन
तमाम लम्हों को
जिसमे तुम मेरे साथ थी..

तुम्हारे दिए कई चुम्बनो के
निशान भले ही मिट गये है

तुम्हारे हर उपहार पर
भी लग गई वक्त की दीमक
पर
कुछ अमिट यादें
शेष है आज भी...

जो कहती है ,तुम आज भी
मेरे पास ही हो
और
रहोगे भी सदा…!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 20 जुलाई 2015

कविता-२०८ : "जीवन दायिनी नर्स ‘अरुणा’ को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए..."

आओ...
एक खेल खेले जिसका नाम है
मजाक...

वर्षो से खेला जा रहा इस
संबिधान युक्त भारत में
नियम कानून समाज
इस खेल के भाग
पर जीत न पाया कोई इस खेल में

नारी अस्मिता
बाल अपराध
यौन शोषण
और भी बहुत कुछ .....

जानते हो एक विशेषता इस खेल की

खेल शुरू करने वाले को
सात साल
और जिस पर खेल रचा उसे
42 साल का दण्ड

उफ्फ्फ्फ़

कैसा अजीब ये खेल
सच मजाक ही है
पर...
कब तक ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता-२०७ : "यादें..."

 तुम्हारे कहने पर
भूल जाऊंगा तुम्हे और
तुम्हारी हर बात को...

गुजरे हुए बीते हुए उन
तमाम लम्हों को
जिसमे तुम मेरे साथ थी...

तुम्हारे दिए कई चुम्बनो के
निशान भले ही मिट गये है
तुम्हारे हर उपहार पर
भी लग गई वक्त की दीमक
पर
कुछ अमिट यादें
शेष है आज भी...

जो कहती है ,तुम आज भी
मेरे पास ही हो
और
रहोगे भी सदा...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 18 जुलाई 2015

कविता-२०६ : "ये इंतजार..."


सदियों सदियों से ही
जन्मो जन्मो तक
चौरासी लाख योनियो में
भटकते हुए...

आत्मा का आत्मा से
ह्रदय की अनंतानत गहराईयो से
तुम्हारे आगमन की प्रथम
नाद का....

इंतजार .....सिर्फ इंतजार
कल आज और कल
सदैव ही....

आ जाओ और खत्म कर दो
ये खेल हमेशा का...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कविता-२०४ : "कविता...."

कोशिश...

मेरे अश्रुओं से सने
हर एक अहसास को
उकेरने की.....
कविता....


भीगी मिट्टी से उपजी

सौंधी खुशबू से विभोर मेरे
अंतस से सृजित
अरुणोदय की प्रथम किरण सी
कविता.....
तुम्हारे केशो में भीगी /लिपटी
उस नन्ही बूँद सी....
सच...

कविता तुम्हारे मेरे मिलन की

परछाई सी.....
कविता तुम जैसी ही
और तुम
कविता जैसी ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 15 जुलाई 2015

कविता-२०३ : "माँ..."

काश, लिख पाता तुम पर
तो शब्द शब्द
महका देता तुम्हारे चरणों में ही
पर चाह कर भी
लिख नहीं पाता
बंध जाता हूँ  ___________

तुम अखिल ब्रह्मण्ड की जनेता
तुम सृष्टि निर्माता
तुम विश्व पूज्य
तुम ममता का अथाह सागर
तुम ज्ञान की प्रथम पाठशाला
तुम त्याग की देवी
तुम नेह का भंडार
तुम अपनत्तव की खान
तुम दिनकर सी तेज
तुम निशा सी शीतल
तुम सागर सी विशाल
तुम धरती सी सहनशील
तुम ____________

और भी कुछ
बहुत कुछ
सब कुछ

जो बंधा हूँ
या असक्षम कहने में

फिर कैसे लिख पाउ तुझ पर
हाँ तुम पर.....

क्योकि
तुमने ही तो लिखी है
मेरे अस्तित्त्व की कहानी
सच,  माँ...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

कविता-२०२ : "माँ... प्यारी माँ..."

सोचा...
 माँ तू सागर जैसी है
पर सागर में उफान देखे है मैंने
और माँ तो उफानो से तुफानो
से रहित होती है.....

फिर सोचा
माँ ,धरती जैसी है
पर हाल ही फटते देखा है मैंने
चीर धरती का
जो लील गया हजारो लोगो को..

फिर सोचा ...
माँ ,आकाश जैसी है
पर अन्तः आकाश की भी सीमा है
पर  माँ तो असीम

फिर तुलना कि मैंने कि
माँ फूल जैसी है
पर फूल भी मुरझा जाते एक दिन
और छोड़ देते महक
पर माँ की महक तो सदा ही...

फिर...

माँ कैसी है ?

तभी माँ की और देखा
माँ मुस्कराई
तब जाना

माँ बिलकुल....
माँ के ही जैसी है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


सोमवार, 13 जुलाई 2015

कविता : २०१ : "प्रेम..."

कुछ वर्ष पूर्व...
जीवन के सोलह बसंत में
लाल गुलाबी गुलाब अच्छे लगते थे
उनकी पंखुरी रख लेता था
किताब के बीच
फिर किताब में दिखने लगता था
प्रेयसी का चेहरा
तब मैं प्रेम में था........

उसकी एक मुस्कान ही
मुझमे लगा देती थी पंख
और
उड़ने लगता था, हवाओ के संग
पहुँच जाता था नील गगन में
जहाँ से धरती  लगती थी छोटी
और दिखती थी तुम ही
तुम लगती थी माँ बाप के
सपनो से / उम्मीद से...
 बड़ी...
तब मैं प्रेम में था.........

मेरी उठती साँसों के प्रत्येक
कम्पन पर
उभर के आता था तेरा नाम
तेरी खुशबू........
तब मैं प्रेम में ही था......

आज करीब बीस वर्ष बाद

बूढ़े माँ बाप  की उम्मीदों का भार
उनके चेहरे की झुर्रियों पर
अपेक्षाओ के निशान
बहिन के पीले हाँथ की चिंता
भाई के पढाई का खर्च
परिवार की जवाबदारी
और भी कुछ....
बहुत कुछ............

जिसको जी रहा हूँ
पल पल
निभाने रिश्ते

अब......
मैं प्रेम में नहीं हूँ बिलकुल
सच....
बल्कि प्रेम मुझमे ही है...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 12 जुलाई 2015

कविता-१९९ : "अंध-विश्वास..."

मेरे हो तुम और रहोगे भी सदा..
 जानता हूँ और मानता भी हूँ
मेरे अश्रुओं के जमी पर गिरने
के पहले
जो हथेली आई
वो तेरी ही तो थी...

लंबी यात्रा के बाद पाँवो में
हुए छालो में
मरहम वाले हाँथ भी तेरे
मेरे सुख में तुम्हारी
मुस्कान
मेरे दुःख में तेरे
आँसू...

सच  तुम मेरे हो सिर्फ
मेरे
और ये विश्वास है मेरा
पर ....
दुनिया के रंग में तुम्हारी
मुहब्बत न हो जाये
बेरंग
और मैं न रहूं तुम्हारा कभी
ये है मेरा
 अन्धविश्वास...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


शनिवार, 11 जुलाई 2015

कविता - १९८ : "मेरे प्रेम..."

झूठ कहने की हद है

और उस हद में कब तक रहू
कब तक कहूँ
खुद से
खुद के आस पास के लोगो से
एक साफ़ झूठ


गवाही नहीं देता अब तो

मेरा खुद का बजूद भी
सच
पीड़ा होती तो दवाई ले लेता
पर, तुम न ही पीड़ा हो
न ही दर्द
फिर मेरे अनकहे स्वप्नों को
साकार न करके
क्यों गए वापिस

सूरज आता है किरणों के साथ

जाकर पुनः आता है
तुमने आने जाने की
क्रिया को पूर्णता दे दी

काश.......

ये विराम आने पर होता
काश.....
या आते ही नहीं तो
काल कोठरी सा जीवन
काला ही होता
पर,
तुम्हारे झूठे दूधिया स्वरूप को
इस ज़माने को कैसे
दिखाऊ
और क्या बताऊ
या हार जाऊ
बोलो
बोलो
बोलो
मेरे प्रेम...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

कविता-१९७ : "मजदूर..."

मजदूर...


तुम मजदूर हो या नहीं

तय करने का पैमाना नहीं
क्योकि
काम तो सभी करते है
पर, मेरे हिसाब से
मजदूर तुम मजबूर जरूर हो
और तुम्हारी मज़बूरी ने ही
मजदूर की संज्ञा दी होगी
विचारणीय ?


मजदूर...

दूर भी है सुख सुविधाओ

और ऐशो आराम की जिंदगी से
पर, ये दूरी या मज़बूरी
मजदूर को पास भी करती है
और खास भी
कितने निश्चिन्त होकर सो जाते
किसी भी पेड़ के नीचे
या हाँथ ठेले पर
ईधर तो लोगो को मखमली
गद्दे पर भी नींद चैन कहाँ
अब ?
तिजोरी जो भरी है
चोरी की आशंका
सोने नहीं देती......

सच, रोटी वाले लोगों के पास
भूख नहीं
मजदूर भूखा है
रोटी के दौड़ता है
पसीना गिराता है
और पेट भर खाये या न खाए
बड़ा चैन आराम पाता है
मजदूर
दूर हो सकता है
पर, पास भी तो है
और लोगो की तुलना में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

कविता-१९६ : "विरह..."

ये कैसा  विरह है तुमसे कि

विरह पश्चात

और नजदीक हूँ तुम्हारे
दैहिक नहीं किन्तु आत्मिक
सच...


पथराई आँखों की सुकड़ी

डिम्बियां अब नम है

तरलता भी आवश्यक है जीने हेतू
मान ही लिया मैंने !

दुनिया के छोर में तुम तो हो
पर, मेरी और नहीं अब
ये तुम ही जान लो
और देख लो
मैं तो जी लूंगा लिखकर
कविताये

तुम पर ही.....



पर, सोचता हो तुम लौट न आओ
विरह की तपिश में
मिलन की बरसात लिए


सुना है किसी से
मेरी कविताओ खींच लेती है

प्रेम को...!!!
-------------------------------------------------------------_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 8 जुलाई 2015

कविता - १९५ : "समीक्षा..."

बहुत छोटा शब्द है ये

पर मायने उतने ही बडे......

एक बूंद के विन्यास पर

सागर जैसा चिंतन
और बूंद दर्शिता का बखान
इतना आसान भी नहीं.....

और बूँद की आत्मा का
सम्पूर्ण कथागत विवेचन

सुखद है
पर, उसके विपरीत
प्रतिकूल
विरोधात्मक
उदगार / विचार
आलोचना...

जो बहुत पसंद है मुझे... !!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

कविता-१९४ : "चाँद तुम पास हो..."

बहुत...

पास हो तुम , ए चाँद

कभी बचपन के मामा
तो कभी मेरे खाली पेट की
गोल रोटी
तो कभी प्रेमिका के चेहरे में
कभी करवाचौथ पर जीवनसंगिनी
की आस्था में
चाँद सिर्फ तुम ही...

और...
 अब तो खुद भी दिखने लगा हूँ
तुममे
लगता है मैं तुम्हारे पास हूँ
या शायद तुम उतर आये
धरती पर....
सच...
चाँद तुम बहुत पास हो...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________