मंगलवार, 10 मार्च 2015

कविता-७७ : "सचिन तेंदुलकर की विदाई..."

कद...
आदमी का छोटा क्यों न हो ?
उसके विचार, सोच और गुण
उसे बड़ा बना ही देते हैं
इतना बड़ा !
कि...

सर्वस्व झुक जाता है उसके आंगे
बड़ी बड़ी हस्तियाँ बड़े बड़े लोग
भी बौने हो नजर आते हैं
उस छोटे कद के आंगे...

24 वर्षो की लगातार मेहनत
व लगन ने ही..
पहुँचाया है तुम्हे आज
क्षितिज के उस आसमान में
जहाँ खेल के महानायक की आँख के
कुछ अश्रु...

विश्व के लोगो की अश्रुधारा में
तब्दील हो गये..
जब तुम्हारे कदम जा रहे थे
मैदान छोड़कर...

तब तुम्हारे कदमो की आहटो से
तालियों की गडगडाहट कह रही थी
मत जाओ...लौट आओ..
पर !
खेल चलता आया है
चलता रहेगा निरंतर...

तुम्हारा विकल्प
स्थान और दर्जा..
नहीं पता कुछ ??
पर ये महाविदाई के पल
स्मृतियों के मधुर कोष में
संछिप्त रहेंगे सदा...

तुम भले ही मैदान से चले गये हो
पर लोगो के दिलो के मैदान में
हमेशा ही रहोगे...
 नॉट आउट...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

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