रविवार, 22 मार्च 2015

कविता-८९ : "आई पिल...है न..."



कल रात मुझसे भूल हो गई
देखा है
ये प्रचार टी वी पर...

इसके आगे भी कुछ है
ये कि
घबराइये नहीं और
खाइये 'आईपिल' या
'अनवांटेड 48'
अनचाहे गर्भ से छुटकारा...

ये तो हो गया दवाई की
कंपनी का प्रदर्शन
पर हकीकत में सोचो
क्या ये भूल औरत से ही हुई
जो वो ही खाये ये दवाई
और गिरा दे अपने ही अंश को...

पुरुष की भूल कहाँ गई
अत्यन्त विचारणीय ??
माना सहवास में नर नारी
दोनों ही समान..
पर वासना से भरे पुरूष को
तब होश नहीं था
जब ये भूल हुई
होता भी कैसे ??

उस वक्त टी वी में
अश्लील चलचित्र जो चल रहा था
जब मुहल्ले के मेडिकल स्टोर
खुले थे
कि ले आये अनचाहे गर्भ
का बचाव
और ये भूल न हो पाये....

पर, फर्क क्या पड़ेगा
गर्म होते ही शरीर दाग देंगे
गोली निशाने पर
औरत के सचेत करने पर भी
और छूटते ही पसीना
फट जायेगी... कि
आ गया नया एक और...

तो... कैसे होगी परवरिश
कैसे आएगा खर्चा पढाई का
और....दिखने लगेगी भूल ...
तुरंत ही...
क्यों न दिखे
देह की गर्मी जो ठण्ड पकड़ ली
और  चलचित्र के बीच बीच
में वो टी वी में प्रचार
'आईपिल' / 'अनवांटेड-48'
भी तो याद है...

खून एक करो या चार
फांसी तो एक ही
अस्सी रूपये की गोली
 लानी ही है
तो 47 घंटे और सही
ये भूल...

औरत तो है ही अपनी
भूल को सुधारने को और...
'आईपिल'... है न....!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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