बुधवार, 4 मार्च 2015

कविता-७१ : "मध्यरात्रि का चाँद..."

मध्य रात्रि का चाँद
और संध्या का सूर्य
दोनों ही
निश्चिन्त नहीं रहते
क्योकि...

अस्थिरता की बदली डिगाने लगते है
इनके स्थिर अहसास को
आशा और उम्मीद भी
टूटने लगती है...

बढते वक्त की चाल में
भरोसे का दामन
भर ही जाता है
आखिर!

समय के अलगाँव में
और भोर होते ही
समय मुस्कराता है
अपनी जीत पर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


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