गुरुवार, 5 मार्च 2015

कविता-७२ : "आसूँ की बूँदें..."


 आसूँ की बूँदें..
तुम्हारी आखों की
गिरती जमीं पर
पहले इसके लगा लिए मैंने  अपने हाँथ...

जिस तरह छोटा बच्चा गदेली में
कोशिश करता है समेटने की
तैरती मछली को...

हाँथ की गदेली में बना कर एक
गड्डा छोटा सा
रखने की हो कोशिश, कीमती मोती की
आंसू भी कीमती मोती ही थे
खारे पानी के स्वाद में...

कई मिठास छिपी थी मेरे लिए
छिपाया , समेटा गदेली की छोटी गहराई में
छोटी किन्तु विशाल भावनाओ की...
प्रदर्शिता को...

सोचा!
अबिलम्ब...
ले जाऊ पवित्र गंगा में करने
समाहित....
या पावन तुलसी में करूँ विसर्जित..
ईश्वर के आले में रखे
उनके अभिषेक के प्रासुक पानी में...

पर!
सोचते सोचते...
बूँदें आंसुओ की..
सूख गई....हवा की तरह..
हवा ही हो गई...

और!
मेरी गदेली की सूखी त्वचा
पर...
अहसासों की कविता लिख गई
मेरी माँ की
अश्रुधारा से...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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