शनिवार, 16 मई 2015

कविता-१४४ : "मेरा प्रेम..."


लाल गुलाब की सुर्ख़ पत्तियो से
तेरे गेसुओं तक...

रश्मिरथी की आगाज से
निशा के आगोश तक...

ऊँचे पर्वत की चोटी से
सागर की गहराई तक...

पंछियो के कल्लोल से
पवन के नाद तक...

ढूँढा मैंने तुम्हे
पर न मिले .....

तभी लगी ठोकर और
गिरा जमी पर
सीने में धंसा एक पत्थर
जिससे निकले रक्त
की बूँद पर...

 अश्रु बहा रहा  था
मेरा 'प्रेम'...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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