शुक्रवार, 1 मई 2015

कविता-१३० : "मजदूर या मजबूर..."



मजदूर________

तुम मजदूर हो या नहीं
तय करने का पैमाना नहीं
क्योकि...
काम तो सभी करते है
पर मेरे हिसाब से
मजदूर तुम मजबूर जरूर हो
और तुम्हारी मज़बूरी ने ही
मजदूर की संज्ञा दी होगी
विचारणीय ?

मजदूर.....
दूर भी है सुख सुविधाओ
और ऐशो आराम की जिंदगी से
 पर ये दूरी या मज़बूरी
मजदूर को पास भी करती है
और खास भी...

कितने निश्चिन्त होकर सो जाते
किसी भी पेड़ के नीचे
या हाँथ ठेले पर

ईधर तो लोगो को मखमली
गद्दे पर भी नींद चैन कहाँ
अब ?
तिजोरी जो भरी है
चोरी की आशंका
सोने नहीं देती......

सच रोटी वाले लोगों के पास
भूख नहीं
मजदूर भूखा है
रोटी को दौड़ता है
पसीना गिराता है
और पेट भर खाये या न खाए

बड़ा चैन आराम पाता है
मजदूर
दूर हो सकता है
पर पास भी तो है
और लोगो की तुलना में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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