गुरुवार, 14 मई 2015

कविता-१४२ : 'में उब गया हूँ..."


मैं ऊब गया हूँ... 
रोज रोज

कागज की पीठ पर
कलम की नोक से खुजली 
करते करते...

रोज के रोज आखरों की
चित्रकारी
विराम पूर्ण विराम
और गणना मात्राओ की...

छंद गीत ग़ज़ल मुक्तक दोहे
और भी कुछ...
इन शब्दों के जाल में
मकड़ी सा 
फंसा / धंसा / और मर भी जाऊ
इन अक्षरो की सेज पर ही
शायद...

अब तो लिखूंगा अंतिम ही
पर कागज की छाती या पीठ पर
नहीं....
तुम्हारी कोमल देह पर
अधरों से शाश्वत कविता ही
और उंगलियो की तूलिका
रचेगी काव्य पिपुशा....

तब सृजित होगा
जिंदगी का महाकाव्य
फिर न कहूँगा कि
मैं ऊब गया हूँ
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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