बुधवार, 20 मई 2015

कविता-१४८ : "ये कैसा दर्द है..."


कह नहीं पा रहा जैसे सदियो से
दबे कुछ अनकहे आखर
हृदय के अंतिम कोने में
उन आखरों के भीतर
भी बहुत कुछ है...
जैसे इस सुर्ख धरा के
भीतर भी 
भले ये आखर निर्जीव हो
पर...

जीवटता बहुत है इनमे
कि कलम से लिखने
पर भी लिखते है तुम्हे ही
ये सजीवता ही है
पर तुम्हे लिख देने से
मेरी अविरल यात्रा का पड़ाव
ठहरता कहाँ...

क्योकि
मैं और मेरी कलम
नहीं लिख पाते मुझे
तुम्हारे साथ
फिर
ये आखर और गर्म हो जाते है
लावे की तरह...

और एक सीमा उपरांत
वो आखर 
उनका संवेग खो देता है
जीवटता
फिर शायद
कविता बन जाती है
सच
कैसा दर्द है ये... 
उफ़...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________




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