शुक्रवार, 15 मई 2015

कविता-१४३ : "ये हो नही सकता..."


ये हो नहीं सकता कि
हो वो
जिसमे सम्भावना हो कहने की
शेष
कि हुआ नहीं ये...

ये हो नहीं सकता कि
हो सकता है कभी
न होने वाली क्रिया और कर्म
मेरे तुम्हारे बीच...

ये हो नहीं सकता कि
रहे कोई भी गुंजाईश
कि मुझसे तुम कहो या
तुमसे मैं कहूँ...

कि ये जमाना अब नहीं
कह रहा हम पर
 क्योकि लिख दी हमने
प्रीत इस ज़माने की छाती पर
और कहने और न कहने का
विषय कर दो बंद
सदा के लिए...

पर, ये हो नहीं सकता
और जो हो सकता है वही तो
कर रहा हूँ मैं...
देख लो...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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