सोमवार, 10 अगस्त 2015

कविता-२२८ : "तुम बिल्कुल मेरे जैसे हो..."

तुम बिलकुल मेरे जैसे हो
इस वाक्य में स्वार्थ दिखता है
मुझे...

विषम लिंगीय चैट और चर्चा
के दौरान
मिलन के प्रारंभिक दौर में
कई बार सामने वाले की
आदतो को सुनकर
कहा जाता यह वाक्य कि
तुम बिलकुल मेरे जैसे हो
इसी आशा के साथ
कि...
इसे कहते ही मिलेगा जवाब
मुस्काते हुए कि
फिर खूब जमेगी हमारी
मित्रता पक्की आज से
पर
क्या कभी कोई किसी के
जैसा....
हो सकता है ??
काश हो सकता तो
हम बहुत कुछ न खोते
खोकर भी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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