शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

कविता-२३२ : "चाँद-सा चेहरा..."

तुम्हारे जन्म लेने से लेकर
मेरे अंतिम दर्शन तक
तुम्हारा चेहरा
चाँद जैसा ही लगा
मुझे...

जब तुम दो महीने की थी
याद है मुझे
तुमसे बतियाने पर
मुस्काती थी तब
चाँद से प्यारा चेहरा लगता था
तुम्हारा...

बचपन में तुम्हारी पग पायल
की मधुर गूँज
घर तो ठीक पड़ोसियों के
मन में उमंग देती थी...

समय के बढ़ते हुए क्रम में
चेहरा और खिलता गया
और एक दिन
यह चाँद सा चेहरा शरद पूर्णिमा
के चाँद सा लगा
पूर्णता लिए अपने आप में
तब माँ बाप ने
समाज की मान्यताओ में
बंधकर
कर दिए हाँथ पीले
घर के प्यारे से चाँद के
लाड /प्यार /दुलार
पग पायल की आवाज
सब हो गई पराई
चाँद की ये कैसी विदाई
की माथे के बीच
लाल डोरे मे
तू बंध गई...

सास ससुर की अवांछित 
उम्मीदों के बोझ से
ससुराल के नियमो से
पति के पुरुषवादी विचारो से
और फिर
दहेज़ का चूल्हा जल ही रहा था
उस चूल्हे की आग में
औरो की तरह तू भी
राख हो गई...

चाँद सिर्फ आकाश में बचा
पर चाँद सा चेहरा
खो गया
सदा के लिए...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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