शनिवार, 22 अगस्त 2015

कविता-२४० : "महामानव..."


सोच रहा हूँ ___
रे मानव , क्या ??
वाकई तूने आज जन्म लिया होगा
क्योकि ___
जन्म लेने के लिए मृत्यु
भी आवश्यक है
पौराणिक है ये चौरासी
हजार योनिया..
जो जन्मा है उसे मौत आएगी
एक दिन
शाश्वत सत्य है !
जन्म लेने वाले को ,सदा
मौत का भय
अमरता की चाह
जिंदगी की भौतिकवादी वस्तुओ
की अभिलाषा
संसारिक गुत्थियों को
प्राप्त करने का स्वप्न__
उन्हें सांसारिक ही बना देता
अपनों की याद में__
पर ______ रे मानव
तुझे ___हाँ तुझे
न जन्म की चाह न मृत्यु का भय
ईश्वर से न भीख की उम्मीद
हर दिन हर रात हर पल
जी रहा जो खुद में
वैचारिक / मानसिक / आंतरिक
जीत तेरी इस
दैविक और भौगिलिक
विचारो की दुनिया पर
इससे परे है तू __
इसलिए तेरे लिए कोई खास
दिवस कहाँ__
हर्ष में शोक और शोक में हर्ष
ढूंढता है तू__
क्योकि पा लिया तुमने
जिंदगी को जी लेने का हुनर
सच...!!!
-----------------------------------------------------------------
_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें