गुरुवार, 20 अगस्त 2015

कविता- २३८ : "भीड़ की सोच..."



भीड़______
सिर्फ समूह ही नहीं
एक सोच भी है
किन्तु
सोच की भीड़ अलग है
और भीड़ की
सोच अलग
मायने बदल गए बस__
झुंड में फंसा एक आदमी
सोचता है , अलग अलग
सदियो से ही ये
भीड़ प्रमाणित रही है
अभिमन्यु भी फंसा था भीड़ में
पर भीड़ से निकला नहीं_
किसी ने भीड़ को चीरा
तो किसी को भीड़ ने |
एक और भीड़ इंसानो से परे
विचारो  की
जिसमे फंसा लगभग हर
आदमी सदियो से ,
और सदियों  तक
जिसे चीरना / छुड़ाना
आसान नहीं
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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