रविवार, 16 अगस्त 2015

कविता-२३४ : "झूला..."


शैशव काल से ही__
झूलने की आदत रही
जन्म पश्चात ही
लिटा दिया गया
झूले में...
बचपन में कभी दरवाजे की
चौखट पर
रस्सी बांधकर / झूला लटकाकर
तो कभी
मेले में / सावन के झूले में
बगीचे में
झूलता ही रहा
आनन्द की प्राप्ति हेतू
किशोरावस्था में ये शौक
कुछ बड़ा हुआ
झूले भी ऊँचे ऊँचे
रफ़्तार के साथ__
हे युवा...
आज कैसा ये शौक
तेरा कि__
तू झूल गया सदा के लिए
हमको
सिर्फ स्मृतियाँ देकर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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