बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कविता-६४ : "सच... मेरे-तुम्हारे...!!!"

वियुक्त हो मुझसे मनन किया होगा तुमने
किंचित क्षुब्ध होउंगा तुम बिन मैं
या पीड़ा होगी मुझे विरह की
अट्टहास....यह मात्र भ्रम है तुम्हारा
और क्षोभ है मुझे
कि यही भ्रम तुम्हे जीवन की ऊर्जा प्रदान करता है

तब से अब तक
जब भ्रम था मुझे
अभिन्न होने का तुमसे
भ्रम था मुझे जब
तुम कभी मुझे नहीं करोगी
परिचित अश्रुओं से
कुछ दिन साथ चले थे जीवन-पथ पर

तब भ्रम था
आजन्म संयुक्ति का
देवरूप के सम्मुख
सौगंध ली थी हमने
भ्रम था
आमरण उस सौगंध पर टिके रहने की

भ्रम था
उनके निभ जाने का
सूची लम्बी है
भ्रमों की
और गहरी है तन्द्रा
मिथ्या प्रतीति की
तुम पढना
मेरा यह आलेख
तब छंटेगा
भ्रम का अभिमाद
यथार्थ की भोर होते ही
तुम्हारी उनींदी आँखें
जब गुजरेंगी
मेरे मुस्कुराते चेहरे से

उन्हें भान होगा
भ्रम के पीछे छुपे
मेरे सच्चे चेहरे से
जो तुमसे बता देंगी
सारे सच
मेरे-तुम्हारे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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