रविवार, 12 अप्रैल 2015

कविता-११० : "कौन अमीर...?"

बालक...

नंगी देह नंगे पैर
चिलचिलाती धूप
और तपती सड़क....
पीठ पर बड़ी सी फटी
चिथी बोरी में..
कचरे में से बीनते हुए
लोहा प्लास्टिक और
कुछ खाली बोतले काँच की
आखिर !
यही तो जिन्दगी है तेरी
और जिन्दगी के मायने भी...

माँ की दवाई
बाप की दारु
बहिन के कपडे
और तेरे खाली पेट का
भूख मिटाने का सामान भी...

पर क्यों ?
जब एक बच्चा चार पहिया में
आधुनिक सुख सुविधाओ में
पलता पोसता बड़ा होता है
इस समाज में ही..

तो क्यों नहीं तुझे ये अधिकार
क्योकि तू गरीब है
निर्धन है, पर क्या  ??

वाकई तू बना है इसी के लिए
तेरी नंगी देह और
चिलचिलाती धूप का रिश्ता
तेरी गरीबी से है  तो
फिर ये समाज भी नहीं

अमीर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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