बुधवार, 8 अप्रैल 2015

कविता-१०६ : "जीवन एक सपना............"


जीवन एक सपना....
इस सपने में कोई नहीं अपना
कोई हकीकत नहीं....
मंजिलो का सुख नहीं....

आँख खुलने के बाद सिर्फ
शून्य ही है सब....
और इसी जीवन को जीवन
को जीते जीते.....

फिर से लग गई ये आँख...


फिर से ये स्वप्न
सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक 
वही झूठे रिश्ते नाते...

लेकिन एक हकीकत भी
है शायद...
वो हो तुम...

और जब जहाँ तुम हो
वहां सपना , सपना नहीं
जिन्दगी हो जाती है...
हां सच मे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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