गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

कविता-११४ : "छुवन..."


तुम्हारी एक बार की छूअन
मेरे ख्वाहिशो की मिटटी को
हकीकत के पाषण में तब्दील कर देती है...

अंततः!

मेरा निरर्थक मन
सार्थक हो चलता है....

जिन्दगी के गीतों में...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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