रविवार, 19 अप्रैल 2015

कविता - ११७ : "क्या हैं सत्य ???"


सत्य को सत्य लिखा 
तो कुछ न मिला...

झूठ को सत्य लिखा
तो कुछ मिला...

फिर लिखा सत्य भी झूठ भी
जहाँ जैसा ठीक लगे...

तब से आराम से जी रहा हूँ
आप के बीच ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________




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