शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

कविता-१२२ : "उन खुबसूरत पलों में...."


उन खूबसूरत पलो में...

कितनी शर्माई थी तुम...
तुम्हारे रोम रोम में लज्जा भरी थी...
झुकी पलकों से तुम्हारे मौन ने
जो कहा था मुझसे...
वो आज भी याद है...

तुम्हारा पहला स्पर्श / छुअन
और गुदगुदी रेशमी बालो की..
भूल सकता हूँ कैसे भला ??

फिर नयी रेशमी चादर पर
सिलवटो के निशान..
कितनी तेजी से जकड़ा था
अपनी मुट्ठी से तुमने...

और फिर मेरी पीठ पर
तुम्हारे नाखून के निशान से
रिसता है प्रणय आज भी
जो नहीं देता भूलने

भूलकर भी तुम्हे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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