शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

कविता-२१२ : "दर्पण..."

दर्पण को देखकर
सत्य को
पहचानने का हुनर
जिनमे है__
वो इस सत्य की वास्तविकता से
जान लेते है
पहचान लेते है..
चेहरे की झुर्रियां
बालो की सफेदी
समय का घटता हुआ क्रम
आभासी दर्पण
में उकेर देता है
पर काश
व्यकि के अक्स के साथ
उभर के आता
इंसान के अंदर छिपा
एक और इंसान
जो है
इंसान के जैसा ही..
पर ऊपर के इंसान के रूप
को दाग लगा देता
कई बार...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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