सोमवार, 6 जुलाई 2015

कविता-१९३ : "आपदा..."

निश्चित ही है एक दिन

ये पृथ्वी / ब्रह्मांड
सिमट जायेगा
और...

 ये धरा जीव जन्तु

पेड़ पौधे नदी नहर पहाड़
सब
सब शुन्य ही...
प्रकृति के इस खेल में

प्रलय या आपदा में
न मैं रहूँगा और न हो कोई
शेष
तब ये कोरे कागज पर
लिखे काले शब्द
नांच उठेगे
चीखेंगे चिल्लायेंगे
और इंसान की यातनाओ
की कहानी
न होगी शेष
अवशेषो पर न ही लूटी जायेगी
नारी की लाज
न ही होंगे जुल्म
और न लटकेगा कोई किसान
शून्य में
सम्भावनाये न होंगी
इंसानो की आदतो की
पर
सृजन के अगले दौर
में कोई न हो
इंसान...
हे भगवान...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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