मंगलवार, 28 जुलाई 2015

कविता-२१६ : "अंतिम सच..."


शमशान में...
अंतिम संस्कार के वक्त
किसी पार्थिव देह के चारो और
जमा भीड़....
और उस भीड़ के बीच मैं
 लकडियो के गट्ठे से सजी
शयन चिता
फूलो से लदे गलहार में लिपटी
देह
जिसके नासा छिद्रो में पाला /रुई
लगाकर.....

अंतिम तैयारी अग्नि भेंट हेतु
 रायचंदो की कर्कश आवाज
मुफ़्त सलाह ज्ञान
इस लकड़ी को यहाँ लगाओ
उस लकड़ी को वहां...

कुछ साधारण प्रवत्ति के लोग
कवि जैसे ही
जिनकी निगाहे मोबाइल की स्क्रीन
पर ही...
शायद कोई कविता ही पढ़ रहे
 मैं अलग-थलग सा व्यक्तिव
पूरी भीड़ में
इकहरा लंबा...शरारती .....
निगाहे जमी देह के चेहरे पर
कि शायद लकडियो के दवाब से
खुल जाये आँख
और आस पास मच जाये भगदड
भूत जैसा ही कुछ जानकर
पर लकडियो के दवाब
पश्चात
वैदिक मंत्रो के साथ अग्नि भेंट
और खुलेगी आँख की शंका
 देखते देखते खाक ही हो गई
और मिटटी मिटटी में मिली
और वहां राख हो गई
 हम और सब भीड़ के लोग
चले गए घर
 पर कल किसी भी खुल सकती है आँख
लकडियो के दबाब में
मैं जाऊंगा  पुनः मरघट
जिंदगी की हकीकत जानने
कि...

सच तो सच है जो लकड़ी क्या
किसी भी दवाब में जीवित
नहीं होता
थमने के बाद...
मरने के बाद...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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