सोमवार, 26 जनवरी 2015

कविता-३० : "सोच... मेरी तुम्हारी..."


मैं हार कर भी जीत गया
क्योकि..
जीत हमारी थी
पर वह कहते है, हार गये
अब हार गया
तो हार गया...

में उंची लहरों से खेला
और अपने घर को आ गया
पर वह कहते है
डूब गये...
अब डूब गया तो
डूब गया...

बंद आँखों तुझको देख रहा
हर पल तुझको तांक लिया..
पर वह कहते है,सो गये
अब सो गया
तो सो गया...

तुमने हमको उलझाया था
हमने तुमको सिखला दिया
पर वह कहते है
झुक गये..
अब झुक गया
तो झुक गया...!!!
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______ आपका अपना ‘अखिल जैन’_______

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