रविवार, 25 जनवरी 2015

कविता-२९ : "अप्रतिम प्रेम"


सोच न इतना तू मुझे
मै करूँगा वही
जो तू चाहता है ....

सुना था ज्यादा सोचने से
चरमरा जाती है नसे
दिमाग की
और बह जाता है रक्त..

जानता हूँ उन रक्त कोशिकाओ में
नाम नहीं है मेरा
फिर भी...
तुम्हारी पीड़ा मेरा दर्द ही रहा
हमेशा....

चला जाऊंगा दूर
बहुत दूरतुमसे और
खुद से भी
फिर ये जमाना और ज़माने
की रीत रख लेना
अपने सामाजिक मर्यादा के
फटे झोलने में...

मै मेरी तन्हाई और मंजिल
दूर मेरा इंतजार करती है
मेरा ही...सदैव
अब ज्यादा लिख कर
वक्त बर्बाद क्यों करूँ....

मै खुश तो जमाना खुश
नहीं गलत है ये
मै खुश तो सिर्फ मै और
मेरा वजूद खुश

अब तुम भी खुश हो जाओ
जा तो रहा हूँ
सच !
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_____आपका अपना 'अखिल जैन'______

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