शुक्रवार, 12 जून 2015

कविता-१७१ : "मुझमें सिवा मेरे..."


तनहाइयो भरी शाम में
दर्द और थकान में...

उलझ गया हूँ गुत्थियों में
सुलझने की चाह में...

वक्त का कसूर ये
लकीरों का दस्तूर ये
नाकामी ही जीत अब
हार के मैदान में...

तू जो गर न पास है
फिर क्या है शेष अब
सिवा मेरे सिवा तेरे
मुझमे... सिवा मेरे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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