बुधवार, 3 जून 2015

कविता-१६२ : "कहाँ जायेगी ये डगर...???"


कहाँ जायेगी ये डगर...

गर पता होता
तो चला न जाता...

पर रुकने से भी फायदा
क्या ?

चलते चलते..और फिसलते
संभलते...फिर और चलते
बढ़ता जाऊंगा

देखकर सूरज , पाने उसे
फिर शायद
गिरूंगा जमी पर और
हो जाऊंगा खत्म...

पर  डगर तो डगर है
कहाँ होगी खत्म
नहीं पता
जायेगी कहाँ ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


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