रविवार, 21 जून 2015

कविता-१७८ : "मिटटी की आवाज़..."


ख़ुशबू मिट्टी की उपजी धरती से

गंध पहुंची सीधे अंतस तक
आनंद बिभोर होता हुआ मन
मयूर की तरह...

जैसे सावन में झूमता है मयूर
ठीक वैसे भी मन मयूर
झूमता मिट्टी की खुशबू में...
सूँघने के साथ आज मैंने
सुनी भी...

मिट्टी की मधुर आवाज..
जो थी बिलकुल मिट्टी की
ही तरह...
सोंधी सोंधी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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