मंगलवार, 16 जून 2015

कविता-१७३ : "इंसानियत..."

मै ईश्वर पर यकीं नहीं करता ज्यादा

न ही उसके चमत्कारों अवतारों पर
प्रार्थनाये धार्मिक क्रिया कांड
सब शून्य ही है मेरे अन्दर
नहीं झुकता आसानी से शीश मेरा
देव आलयो और पत्थरो के आंगे
पर एक चीज एक बात जो
हरदम झुका देती है 
सर्वस्व मेरा लुटा देती है
वह है इन्सानियत...

और ये इंसानियत / मानव सेवा
ही दिलाती है मेरा धर्म
मेरी प्रार्थना और मेरा
ईश्वर...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

2 टिप्‍पणियां:

  1. इंसानियत के आगे कहाँ कोई शक्ति ठहर सकती है...

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  2. इंसानियत के आगे कहाँ कोई शक्ति ठहर सकती है...

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